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बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

दोहे "सिंह बने शृंगाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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वासन्ती मौसम हुआ, सुधर रहे हैं हाल।
सूर्यमुखी ऐसे खिला, जैसे हो पिंजाल*।।
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शैल-शिखर पर कल तलक, ठिठुरा था सिंगाल*
सूर्य-रश्मियाँ कर रहीं, उनको आज निहाल।।
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राजनीति में बन गये, बगुले आज मराल।
सन्तों का चोला पहन, पनप रहे पम्पाल*
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हिंसा के परिवेश में, सिंह बने शृंगाल।
पत्र-निलय में आजकल, गायब हुए टपाल*।।
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मँडराते हैं गगन में, चील और कौवाल*
दानव जैसे हो गये, मानव आज कराल*।।
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नदियों में कीचड़ दिखी, हालत है विकराल।
तालाबों में उग रहे, जहाँ-तहाँ शैवाल।।
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जगह-जगह पर हो रहे, दंगे और बवाल।
राजनीति की आग में, जलता है बंगाल।।
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शब्दार्थः-
पिंजाल-स्वर्ण, सिंगाल-पहाड़ी बकरा, पम्पाल-दुष्ट, 
टपाल-चिट्ठी/पत्री, कौवाल-कौआ, कराल-दुष्ट

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

    जवाब देंहटाएं
  2. नये शब्दों से परिचय कराती सदा की तरह अप्रतिम दोहावली !
    सादर प्रणाम !

    जवाब देंहटाएं
  3. बासंती रंग में रंगी सुन्दर संदेश देती समसामयिक रचना..

    जवाब देंहटाएं
  4. मँडराते हैं गगन में, चील और कौवाल*।
    दानव जैसे हो गये, मानव आज कराल*।।


    सुन्दर दोहे....

    जवाब देंहटाएं
  5. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 18.02.2021 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा| आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  6. मँडराते हैं गगन में, चील और कौवाल*।
    दानव जैसे हो गये, मानव आज कराल*।।
    --
    नदियों में कीचड़ दिखी, हालत है विकराल।
    तालाबों में उग रहे, जहाँ-तहाँ शैवाल।।

    वाह...
    हृदयग्राही दोहे

    जवाब देंहटाएं
  7. हमेशा की तरह लाजबाब सर ,सादर नमन आपको

    जवाब देंहटाएं
  8. राजनीति में बन गये, बगुले आज मराल।
    सन्तों का चोला पहन, पनप रहे पम्पाल।

    आज के हालात को बखूबी चित्रित करती श्रेष्ठ रचना...🌹🙏🌹

    जवाब देंहटाएं

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