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गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

गीत "उसूल बाँटता रहा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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लक्ष्य तो मिला नहीं, राह नापता रहा।
काव्य की खदान में, धूल चाटता रहा।।
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पथ में जो मिला मुझे, मैं उसी का हो गया।
स्वप्न के वितान में, मन नयन में खो गया।
शूल की धसान में, फूल छाँटता रहा।
काव्य की खदान में, धूल चाटता रहा।।
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चेतना के गाँव में, चेतना तो सो गयी।
अन्धकार छा गया, सुबह से शाम हो गयी,
और मैं मकान में, गूल पाटता रहा।
काव्य की खदान में, धूल चाटता रहा।।
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रत्न खोजने चला हूँ, पर्वतों के देश में।
अभी तो कुछ मिला नहीं, पत्थरों के वेश में।
किन्तु ख़ानदान में, उसूल बाँटता रहा।
काव्य की खदान में, धूल चाटता रहा।।
--
चन्द्रिका मयंक की, तन-बदन जला रही।
कुटिलग्रहों की चाल अब, कुचक्र को चला रही।
और मैं मचान की, झूल काटता रहा।
काव्य की खदान में, धूल चाटता रहा।।
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6 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 05-02-2021) को
    "समय भूमिका लिखता है ख़ुद," (चर्चा अंक- 3968)
    पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.


    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया सर!
    आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ।

    जवाब देंहटाएं
  3. रत्न खोजने चला हूँ, पर्वतों के देश में।
    अभी तो कुछ मिला नहीं, पत्थरों के वेश में।
    किन्तु ख़ानदान में, उसूल बाँटता रहा।
    काव्य की खदान में, धूल चाटता रहा।।

    लाजवाब...

    जवाब देंहटाएं
  4. पथ में जो मिला मुझे, मैं उसी का हो गया।
    स्वप्न के वितान में, मन नयन में खो गया।
    बहुत खूब,सादर नमन सर

    जवाब देंहटाएं

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