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रविवार, 7 फ़रवरी 2021

दोहे "पश्चिम के दिन-वार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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रोज-रोज आता नहींप्यारा दिवस गुलाब।
बाँटों महक गुलाब सीसबको आज ज़नाब।।
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प्रणय-प्रीत के प्रथम दिनबाँट रहा मुस्कान।
सह कर पीर गुलाब-गुलकभी  होता म्लान।।
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आता है मधुमास मेंप्रणय-प्रीत सप्ताह।
चाह अगर हो हृदय मेंमिल जाती है राह।।
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काँटों में पलता हुआहँसता-खिलता रोज।
बाँट रहा ऋतुराज मेंसबको खुशी मनोज।।
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ढोंग-दिखावा हैं सभीपश्चिम के दिन-वार।
रोज बदलते हैं जहाँ, लोगों के दिलदार।।
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6 टिप्‍पणियां:

  1. ढोंग-दिखावा हैं सभी, पश्चिम के दिन-वार।
    रोज बदलते हैं जहाँ, लोगों के दिलदार।।
    --बहुत सही कहा शास्त्री जी आपने..समसामयिक और मनभावन दोहे..

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह... Rose Day पर भारतीयता की भावना से सराबोर बेहतरीन दोहों के लिए साधुवाद आदरणीय 🙏

    जवाब देंहटाएं
  3. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार 08 फ़रवरी 2021 को 'पश्चिम के दिन-वार' (चर्चा अंक- 3971) पर भी होगी।--
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

    जवाब देंहटाएं
  4. रोज बदलते हैं जहाँ, लोगों के दिलदार----बहुत बढ़िया शास्त्री जी

    जवाब देंहटाएं

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