"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

फ़ॉलोअर

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

गीत "आँसू यही बताते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

--

दुख आने पर नयन बावरे,
खारा जल बरसाते हैं।
हमें न सागर से कम समझो,
आँसू यही बताते हैं।।
--
हार नहीं जो कभी मानता,
पसरे झंझावातों से,
लेकिन हुआ पराजित मनवा,
अपनों की कटु बातों से,
चोट अगर दिल पर लगती,
तो आँसू को ढरकाते हैं।
हमें न सागर से कम समझो,
आँसू यही बताते हैं।।
--
सुमन हमेशा काँटों के,
सँग-साथ खिला करता है,
अमृत के ही साथ सिन्धु में,
गरल मिला करता है,
दुख में भरी वेदना कितनी,
आँसू सब कह जाते हैं।
हमें न सागर से कम समझो,
आँसू यही बताते हैं।।
--
ज्वार और भाटा जीवन के,
साथ चला करते हैं,
नकली कागज के प्रसून,
हर बार छला करते हैं,
आपा-धापी की महफिल में,
झूठा जश्न मनाते हैं।
हमें न सागर से कम समझो,
आँसू यही बताते हैं।।
--
कभी-कभी दिनकर भी,
कुछ शीतलता दे जाता है,
लेकिन शीतल चन्दा भी तो,
दिल में आग लगाता है।
सुखद सलोने सपने मन में,
झूठी आस बँधाते हैं।
हमें न सागर से कम समझो,
आँसू यही बताते हैं।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 26-02-2021) को
    "कली कुसुम की बांध कलंगी रंग कसुमल भर लाई है" (चर्चा अंक- 3989)
    पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.


    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  2. --
    ज्वार और भाटा जीवन के,
    साथ चला करते हैं,
    नकली कागज के प्रसून,
    हर बार छला करते हैं,
    आपा-धापी की महफिल में,
    झूठा जश्न मनाते हैं।
    हमें न सागर से कम समझो,
    आँसू यही बताते हैं।।..सुन्दर मर्मस्पर्शी भावों की अभिव्यक्ति..

    जवाब देंहटाएं
  3. आंसू बहुत कुछ कहते हैं..आपकी रचना ने आंसू के हर मर्म को उजागर कर दिया है..बहुत सुंदर

    जवाब देंहटाएं
  4. आँसू सब कुछ कह देते हैं मन की बात ।
    सुंदर गीत ।

    जवाब देंहटाएं
  5. दुख में भरी वेदना कितनी,
    आँसू सब कह जाते हैं।
    हमें न सागर से कम समझो,
    आँसू यही बताते हैं।।

    आंसू के मर्म को कितनी गहराई से महसूस किया है आपने आदरणीय ! ... और फिर उसे सरस गीत में ढाला है...
    साधुवाद 🙏
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

    जवाब देंहटाएं
  7. दुख आने पर नयन बावरे,
    खारा जल बरसाते हैं।
    हमें न सागर से कम समझो,
    आँसू यही बताते हैं।।

    बहुत ही सुंदर,सार्थक संदेश देती रचना आदरणीय सर,सादर नमन आपको

    जवाब देंहटाएं
  8. हमें न सागर से कम समझो,
    आँसू यही बताते हैं।।आदरणीय सर कमाल की लेखनी और उसके भाव। मन को अनायास भा गई आपकी रचना। हार्दिक शुभकामनाएँ और प्रणाम 🙏🙏💐💐

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत सुंदर और सार्थक सृजन आदरणीय।

    जवाब देंहटाएं
  10. बहुत बढियां रचना, आंसूओं के हर मर्म को दर्शाती है

    जवाब देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails