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रविवार, 28 फ़रवरी 2021

गीत "मौसम ने ली है अँगड़ाई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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पवन बसन्ती लुप्त हो गई,
मौसम ने ली है अँगड़ाई।
गेहूँ की बालियाँ सुखाने,
पछुआ पश्चिम से है आई।।
पर्वत का हिम पिघल रहा है,
निर्झर बनकर मचल रहा है,
जामुन-आम-नीम गदराये,
फिर से बगिया है बौराई।
गेहूँ की बालियाँ सुखाने,
पछुआ पश्चिम से है आई।।
रजनी में चन्दा दमका है,
पूरब में सूरज चमका है,
फुदक-फुदककर शाखाओं पर,
कोयलिया ने तान सुनाई।
गेहूँ की बालियाँ सुखाने,
पछुआ पश्चिम से है आई।।
वन-उपवन की शान निराली,
चारों ओर विछी हरियाली,
हँसते-गाते सुमन चमन में,
भँवरों ने गुंजार मचाई।
गेहूँ की बालियाँ सुखाने,
पछुआ पश्चिम से है आई।।
सरसों का है रूप सलोना,
कितना सुन्दर बिछा बिछौना,
मधुमक्खी पराग लेने को,
खिलते गुंचों पर मँडराई।
गेहूँ की बालियाँ सुखाने,
पछुआ पश्चिम से है आई।।
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14 टिप्‍पणियां:

  1. मौसम ने कुछ जल्दी ही ले ली अंगड़ाई । खूबसूरत गीत ।

    जवाब देंहटाएं
  2. आदरणीय डाँ. साहब प्रणाम !
    सरसों का है रूप सलोना,
    कितना सुन्दर बिछा बिछौना,
    मनभावन रचना सहित आपको सादर अभिनंदन !

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (01 -03 -2021 ) को 'मौसम ने ली है अँगड़ाई' (चर्चा अंक-3992) पर भी होगी।आप भी सादर आमंत्रित है।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

    जवाब देंहटाएं
  4. मनभावन दृश्य बदलते मौसम और वसन्त का , सुन्दर सृजन, बधाई

    जवाब देंहटाएं
  5. मनोहारी दृश्यों का सुंदर वर्णन ..

    जवाब देंहटाएं
  6. वासंती बयार बहाती बहुत सुन्दर रचना.
    हम कंक्रीट के जंगलों में रहने वाले तो ऋतुओं का आनंद उठाने से प्रायः वंचित ही रह जाते हैं.

    जवाब देंहटाएं
  7. प्रकृति के बदलते स्वरूप पर मनोहर गीत ।

    जवाब देंहटाएं
  8. प्रणाम शास्त्री जी, बहुत खूब गीत ल‍िखा...पूरा का पूरा मौसम ही छान द‍िया इसमें तो...वाह

    जवाब देंहटाएं
  9. गेहूँ की बालियाँ सुखाने,
    पछुआ पश्चिम से है आई।।

    आदरणीय शास्त्री जी,
    नमन 🙏
    प्रकृति चित्रण में आपका जवाब नहीं... वसंत पर कविता रचते हुए गेहूं की सुध बिरले ही लेते हैं।
    साधुवाद
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  10. बेहद खूबसूरत रचना आदरणीय 👌

    जवाब देंहटाएं

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