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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

गीत "बज उठी वीणा मधुर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
खिल उठा सारा चमन
,
दिन आ गये हैं प्यार के।
रीझने के खीझने के,
प्रीत और मनुहार के।। 
--
चहुँओर धरती सज रही है,
डालियाँ सब फूलती,
पायल छमाछम बज रहीं,
नव-बालियाँ हैं झूलती,
डोलियाँ सजने लगीं,
दिन आ गये शृंगार के।
रीझने के खीझने के,
प्रीत और मनुहार के।।
--
झूमते हैं मन-सुमन,
गुञ्जार भँवरे कर रहे,
टेसुओं के फूल वन में, 
रंग अनुपम भर रहे,
गान कोयल गा रही,
दिन आ गये अभिसार के।
रीझने के खीझने के,
प्रीत और मनुहार के।।
--
कचनार की कच्ची कली भी,
मस्त हो बल खा रही,
हँस रही सरसों निरन्तर,
झूमकर कर इठला रही,
बज उठी वीणा मधुर,
सुर सज गये झंकार के।
रीझने के खीझने के,
प्रीत और मनुहार के।। 
--

9 टिप्‍पणियां:

  1. हृदयग्राही सुंदर गीत...
    वसंतपंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं आदरणीय 🙏

    जवाब देंहटाएं
  2. आदरणीय, कृपया इस लिंक का भी अवलोकन करें। आपके दोहे भी शामिल हैं इसमें....

    दोहाकारों की दृष्टि में वसंत

    जवाब देंहटाएं
  3. बसंत पंचमी की शुभ कामनाएं ..
    जीवन बसंत हो..
    आपका लेख अनंत हो..

    नमन आपको

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर रचना, बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर.. मन मोहती नायाब रचना..

    जवाब देंहटाएं
  6. वसंत का मनोहारी चित्रण

    जवाब देंहटाएं
  7. दिन आ गये शृंगार के
    रीझने के खीझने के,
    प्रीत और मनुहार के

    बसंत की खुशबु से सराबोर करता बहुत ही सुंदर सृजन आदरणीय सर,सादर नमन आपको

    जवाब देंहटाएं

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