शनिवार, 6 फ़रवरी 2021

दोहे "पश्चिम की है सभ्यता, थोड़े दिन का प्यार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
शुरू हो रहा आज से, विश्व प्रणय सप्ताह।
लेकिन मौसम कर रहा, सब अरमान तबाह।।
--
बारिश-कुहरे से घिरा, पूरा उत्तर देश।
नहीं बना मधुमास में, बासन्ती परिवेश।।
--
नभ आँसू टपका रहा, सहमे रस्म-रिवाज।
बहुत विलम्बित हो रहा, ऐसे में ऋतुराज।।
--
लौट-लौट कर आ रहा, हाड़ कँपाता शीत।
मौसम ने छेड़ा नहीं, मनभावन संगीत।।
--
प्रणय-निवेदन के लिए, मौसम है प्रतिकूल।
उपवन में अब तक नहीं, खिले बसन्ती फूल।।
--
सरसों फूली ही नहीं, हरे-हरे सब खेत।
सुमनों बिन सूने पड़े, अब भी हृदय-निकेत।।
--
पश्चिम की है सभ्यता, थोड़े दिन का प्यार।
प्रणय-दिवस के बाद में, हो जाती तकरार।।
--

5 टिप्‍पणियां:

  1. पश्चिम की है सभ्यता, थोड़े दिन का प्यार।
    प्रणय-दिवस के बाद में, हो जाती तकरार।।

    सुंदर, सटीक दोहे आदरणीय!!!
    सादर नमन 🌹🙏🌹
    - डॉ शरद सिंह

    जवाब देंहटाएं
  2. बारिश-कुहरे से घिरा, पूरा उत्तर देश।
    नहीं बना मधुमास में, बासन्ती परिवेश।।

    यहां इस मध्यप्रदेश की भी यही हालत है। बहुत शानदार दोहे.... साधुवाद आदरणीय 🙏
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  3. पश्चिम की है सभ्यता, थोड़े दिन का प्यार।
    प्रणय-दिवस के बाद में, हो जाती तकरार।।

    सुंदर संदेश देती रचना सादर नमन सर

    जवाब देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।