-- सुलगते प्यार में, महकी हवाएँ आने वाली हैं। दिल-ए-बीमार को, देने दवाएँ आने वाली हैं।। -- चटककर खिल गई कलियाँ, महक से भर गई गलियाँ, सुमन की सूनी घाटी में, सदाएँ आने वाली है। दिल-ए-बीमार को, देने दवाएँ आने वाली हैं।। -- चहकने लग गई कोयल, सुहाने हो गये हैं पल, नवेली कोपलों में, अब अदाएँ आने वाली हैं। दिल-ए-बीमार को, देने दवाएँ आने वाली हैं।। -- जवानी गीत है अनुपम, भरे इसमें हजारों खम, सुधा रसधार बरसाने, घटाएँ आने वाली हैं। दिल-ए-बीमार को, देने दवाएँ आने वाली हैं।। -- दिवस है प्यार करने का, नही इज़हार करने का, करोगे इश्क सच्चा तो, दुआएँ आने वाली हैं। दिल-ए-बीमार को, देने दवाएँ आने वाली हैं।। -- |
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सादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-1-22) को "पथ के अनुगामी"(चर्चा अंक 4319)पर भी होगी।आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
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कामिनी सिन्हा
बहुत सुंदर गीत ग़ज़ल के अंदाज में
जवाब देंहटाएंसरस सृजन।
बहुत ही खूबसूरत और प्यारी रचना!
जवाब देंहटाएंआदरणीय शास्त्री सर, नमस्ते👏! बहुत ही कोमल भावों से सुसज्जित रचना:
जवाब देंहटाएंचटककर खिल गई कलियाँ,
महक से भर गई गलियाँ,
सुमन कीसूनी घाटी में,सदाएँ आने वाली है।
साधुवाद!--ब्रजेंद्रनाथ
वसंत ऋतु का ऐसा सुन्दर स्वागत !
जवाब देंहटाएंबहुत ख़ूब !
दिल-ए-बीमार को, देने दवाएँ आने वाली हैं... वाह!सर।
जवाब देंहटाएंसादर