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शनिवार, 13 जून 2020

दोहे "रण में लड़ना जंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ' मयंक')

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देशभक्ति के कर्म का, समझ लीजिए मर्म।
रण में जाकर जूझना, सैनिक का है धर्म।।
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बैरी पग-पग बदलता, गिरगिट जैसे रंग।
रण में बुद्धि-विवेक से, जाकर लड़ना जंग।।
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मन में रक्खो हौसला, खो मत देना होश।
रण में अन्तिम साँस तक, रखना होगा जोश।।
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प्यार-जंग के खेल में, होता सब कुछ माफ।
पथ में जो कंटक मिलें, उनको करना साफ।।
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काम करो दिन में सदा, रातों को विश्राम।
संघर्षों से जीत लो, जीवन का संग्राम।।
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मिलते हैं रण भूमि में, पग-पग पर आघात।
तारतम्य से ही बनें, बिगड़ी सारी बात।।
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दुर्घटनाओं को सदा, देना पूर्ण विराम।
हँसी-खेल होता नहीं, जीवन का संग्राम।।
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6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर चिन्तनपूर्ण रचना

    जवाब देंहटाएं
  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार(-१४- 0६-२०२०) को शब्द-सृजन- २५ 'रण ' (चर्चा अंक-३७३२) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  3. अत्यंत सुन्दर एवं सार्थक दोहे ! बहुत बढ़िया !

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर सार लिए सार्थक सृजन ।

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह!!!!
    बहुत सुन्दर सार्थक दोहे...।

    जवाब देंहटाएं
  6. ओजस्विता से परिपूर्ण प्रेरक सृजन।

    सादर नमन सर।

    जवाब देंहटाएं

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