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शुक्रवार, 19 जून 2020

ग़ज़ल "चदरिया अब तो पुरानी हो गयी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

उम्र की अब मेजबानी हो गयी
सुर्ख काया जाफरानी हो गयी

सोच अब अपनी सयानी हो गयी
चदरिया अब तो पुरानी हो गयी

ज़िन्दग़ी की मेहरबानी हो गयी
इश्क की पूरी कहानी हो गयी

झुर्रियाँ पड़ने लगीं अब जिस्म में
खून की मद्धम रवानी हो गयी

अब नहीं कुछ 'रूप' के ज़लवे रहे
खत्म अब सारी जवानी हो गयी
--

7 टिप्‍पणियां:

  1. ग़ज़ल अलग है सर मगर आप तो अभी भी युवा हे सर

    जवाब देंहटाएं
  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार(२० -०६-२०२०) को 'ख्वाहिशो को रास्ता दूँ' (चर्चा अंक-३७३८) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत ही सुंदर आदरणीय शास्त्री जी पर यह दिल तो आज भी जवान है

    जवाब देंहटाएं
  4. आदरणीय शास्त्री जी,उम्र के साथ शरीर जवान नहीं रहता यह सही है। लेकिन आपके जैसे कर्मवीर हमेशा अपने कार्यो से जवान ही रहते हैं।

    जवाब देंहटाएं
  5. झुर्रियाँ पड़ने लगीं अब जिस्म में
    खून की मद्धम रवानी हो गयी

    अब नहीं कुछ 'रूप' के ज़लवे रहे
    खत्म अब सारी जवानी हो गयी

    दस्तूर-ए-दुनिया, सर । उम्दा रचना।

    जवाब देंहटाएं
  6. झुर्रियाँ पड़ने लगीं अब जिस्म में
    खून की मद्धम रवानी हो गयी
    वाह!!!!
    लाजवाब।

    जवाब देंहटाएं

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