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रविवार, 7 जून 2020

दोहे "बिगड़ गया अनुपात" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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समझ लीजिए नीति का, थोड़ा सा भावार्थ।
पूजा होती तब तलक, जब तक रहता स्वार्थ।।
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भक्त और भगवान का, बिगड़ गया अनुपात।
मतलब के कारण हुए, आज विकट हालात।।
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मतलब के सम्बन्ध हैं, झूठे माया-मोह।
लालच के कारण उगी, मन में ऊहापोह।।
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सूख गया दिल का कुआँ, नहीं रहा अब प्यार।
चार दिनों के बाद ही, अलग हो गये द्वार।।
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प्यार नहीं अब सरसता, टूट रहे परिवार।
पुत्र पिता से छीनता, मुखिया का अधिकार।।
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जीवित बापू से नहीं, सुत करते हैं प्रीत।
आर्य पुत्र अपना रहे, यवन काल की रीत।।
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भाई-भाई में बहुत, होती है तकरार।
दोनों के है बीच में, अलग हुए घर-बार।।
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लड़ के लड़के ले रहे, माल और असबाब।
मात-पिता को टका सा, देते पूत जवाब।।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर, नीति का उपदेश देते सुंदर दोहे। सादर प्रणाम।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (08-06-2020) को 'बिगड़ गया अनुपात' (चर्चा अंक 3726) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    -रवीन्द्र सिंह यादव


    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत ही सुंदर दोहे आदरणीय सर.

    जवाब देंहटाएं

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