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गुरुवार, 11 जून 2020

दोहे "बौने हुए गिरित्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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उपमा में उपमान का, नहीं हो रहा मेल।
दोहे रचना समझते, लोग आजकल खेल।।
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शब्द चुटीले हैं नहीं, कोरी बनी लिखास।
गुणवत्ता का हो रहा, इसीलिए तो ह्रास।।
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छन्दबद्ध रचना हुई, नवयुग में उपहास।
हिन्दी का कैसे भला, होगा आज विकास।।
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लिखकर अपने गद्य को, कविता कहते लोग।
कोरोना सा बन गया, लाइलाज यह रोग।।
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मंजिल अब कैसे मिले, बिगड़ गयी है चाल।
कथित पद्य में आज तो, गायब हैं सुर-ताल।।
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ज्ञान-सिन्धु की हो गयी, हालत बड़ी विचित्र।
भगवानों के सामने, बौने हुए गिरित्र।।
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धार हुई अवरुद्ध हैं, सरिताओं की आज।
अज्ञानी खुद शान से, लिखते हैं कविराज।।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार
    (12-06-2020) को
    "सँभल सँभल के’ बहुत पाँव धर रहा हूँ मैं" (चर्चा अंक-3730)
    पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  2. उस पर विडंबना है कि अपना सब पढवाना चाहते हैं पर खुद किसी का लिखा पढ़ने का कष्ट गवारा नहीं करते

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर दोहे आदरणीय

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह , आदरणीय शास्त्री जी .सुन्दर सटीक दोहे . सच है छन्दबद्ध रचना आसान नहीं होती . अतुकान्त भी कभी कभी बड़ी गहरी होती है पर अब जैसा कि आपने कहा गद्य को पद्य का रूप दिया जा रहा है जो मन को कहीं नहीं छूता . हाँ गिरित्र शब्द मेरे लिये नया है . अच्छा लगा .

    जवाब देंहटाएं

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