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शुक्रवार, 5 जून 2020

दोहे "काम कलम का बोलता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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काम कलम का बोलता, नहीं बोलता नाम।
छोड़ मान-व्यामोह को, करते रहना काम।।
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लोगों में सम्मान की, लगी हुई है होड़।
करते लोग खुशामदें, मसी-लेखनी छोड़।।
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दिल पर करते असर हैं, दिल से निकले भाव।
बिना कलम के आसरे, पार न होगी नाव।।
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प्रतिभाओं का हो रहा, दुनिया में अपमान।
क्रय करते कुछ लोग हैं, अब झूठे सम्मान।।
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सम्मानों की दौड़ से, रखना खुद को दूर।
लिख करके साहित्य को, मत होना मगरूर।।
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मंचों पर आसीन हैं, अब झूठे आरोह।
सम्मानों की दौड़ में, पागल हुए गिरोह।।
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ओत-प्रोत हों छन्द से, गजल, दोहरे-गीत।
छन्दमुक्त होता नहीं, कोई भी संगीत।।
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गद्य-पद्य के साथ में, लिखो कथानक-कथ्य।
कालजयी वो काव्य है, जिसमें होता तथ्य।।
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5 टिप्‍पणियां:

  1. सच सच्चे कलम के सिपाही की कभी न कभी जय जय जरूर होती है भले ही देर लगे , झूठ-फरेब ज्यादा दिन नहीं चल पाता, उसे एक दिन हवा में उड़ जाना ही होता है
    बहुत अच्छी प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत खूब शास्त्री जी, मस‍िजीव‍ियों पर अच्छा तंज़ कसा आपने...काम कलम का बोलता, नहीं बोलता नाम।
    छोड़ मान-व्यामोह को, करते रहना काम।।
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    लोगों में सम्मान की, लगी हुई है होड़।
    करते लोग खुशामदें, मसी-लेखनी छोड़।।...

    जवाब देंहटाएं
  3. साहित्यसेवा के नाम पर हो रही नाटकबाजी को उजागर करती, साथ में बहुमूल्य सीख देती हुई रचना। सादर प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं

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