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मंगलवार, 9 जून 2020

दोहे "जब मन में हो चाह" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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आहत वृक्ष कदम्ब कातकता है आकाश। 
अपनी शीतल छाँव मेंबंशी रहा तलाश।।
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माटी जैसी हो वहीदेता है आकार।
कितने श्रम पात्र कोगढ़ता रोज कुम्हार।।
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शब्दों में अपने नहींकरता कभी कमाल।
कच्ची माटी जब मिलेदूँ साँचों में ढाल।।
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चिन्तन-मन्थन के लिएमिलता कच्चा माल।
रोज-रोज लिख दीजिएसच्चा-सच्चा हाल।।
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ठोकर खा कर सभी कोमिल जाती है राह। 
लेकिन होनी चाहिएमन में सच्ची चाह।।
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झंझावातों में सभीबने हुए हैं बैल। 
मंजिल तब कैसे मिलेजब मन में हो मैल।।
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कंकड़-काँटों से भरीप्यार-प्रीत की राह। 
बन जाती आसान तबजब मन में हो चाह।।
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लोकतन्त्र में न्याय सेअक्सर होती भूल। 
कौआ मोती निगलताहंस फाँकते धूल।।
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जिनको प्यार-दुलार सेपाल रहे हों शूल।
सबके मन को मोहतेउपवन के वो फूल।।
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13 टिप्‍पणियां:

  1. आपके दोहों का जवाब नहीं ... हर बात पे दोहा हक़ सकते हैं आप ... वाह प्रणाम शास्त्री जी ...

    जवाब देंहटाएं
  2. लोकतन्त्र में न्याय से, अक्सर होती भूल।
    कौआ मोती निगलता, हंस फाँकते धूल।।
    बहुत सही।

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत खूबसूरत सत्य को दर्शाती है

    जवाब देंहटाएं
  4. झंझावातों में सभी, बने हुए हैं बैल।
    मंजिल तब कैसे मिले, जब मन में हो मैल।।
    Full of meaning and intent rhythm and all that makes poetry sublime.
    kabirakhadabazarmein.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  5. It is not unknown and is : veeruji05.blogspot.com ; veerujialami.blogspot.com; veerujan.blogspot.com; veerubhai1947.blogspot.com;
    झंझावातों में सभी, बने हुए हैं बैल।
    मंजिल तब कैसे मिले, जब मन में हो मैल।।
    Full of meaning and intent rhythm and all that makes poetry sublime.
    kabirakhadabazarmein.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  6. Beloved reverend shstriji i am thankful to you for giving space to my write ups at kabirabakhadabazarmein.blogspot.com , due to burning of cookies in my computer i am not able to post comments .This computer belongs to my grandson and hence am able to post as unknown .Regards i am sharing all yr valueable posts at FB and twitter.com

    जवाब देंहटाएं
  7. pl communicate yr contact numbers at veerubhai1947@gmail.com ; i am at 85 88 98 7150

    जवाब देंहटाएं
  8. देखन में छोटे लगें ,बात कहें गंभीर,
    शास्त्री जी के दोहरे कहें समय की पीर .

    जवाब देंहटाएं
  9. --
    आहत वृक्ष कदम्ब का, तकता है आकाश।
    अपनी शीतल छाँव में, बंशी रहा तलाश।।
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    माटी जैसी हो वही, देता है आकार।
    कितने श्रम पात्र को, गढ़ता रोज कुम्हार।।
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    शब्दों में अपने नहीं, करता कभी कमाल।
    कच्ची माटी जब मिले, दूँ साँचों में ढाल।।
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    चिन्तन-मन्थन के लिए, मिलता कच्चा माल।
    रोज-रोज लिख दीजिए, सच्चा-सच्चा हाल।।
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    बेहतरीन दोहे शास्त्री जी नमस्कार

    जवाब देंहटाएं

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