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शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

‘‘मंगल ही मंगल होता है, इस दंगल में’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



इंद्र जाल है, या कोई काला जादू है,

रोज नया आता है, तोता इस दंगल में।


कुछ हैं बहुत पुराने, लेकिन सीधे-सच्चे,

कुछ ताऊ, कुछ बापू हैं, और कुछ हैं बच्चे,

सभी सीखते दाँव-पेंच हैं, इस दंगल में।


खुला हुआ है द्वार, बना है सुन्दर बाड़ा,

पट्ठों के लड़ने की खातिर, बना अखाड़ा,

केवल शब्द द्वन्द्व होता है, इस दंगल में।


उड़नतश्तरी सा समीर, बहता जाता है,

शिकवे और शिकायत भी, सहता जाता है,

प्रीत-रीत-मनुहार बसी है, इस दंगल में।


वसुधा है परिवार, नही है भेद देश का,

भरा हुआ अभिमान, सभी में है स्वदेश का,

नौ गज के सब पीर, बसे हैं इस दंगल में।


विद्या और विज्ञान बहुत है,

मान और सम्मान बहुत है,

तकनीकी का ज्ञान बहुत है,

चोरी का सामान बहुत है,

मंगल ही मंगल होता है, इस दंगल में।

17 टिप्‍पणियां:

  1. इस मंगलमय दंगल में अनदेखे भी अपने बन जाते हैं।

    जवाब देंहटाएं
  2. सर बहुत सुन्दर रचना . आभार

    जवाब देंहटाएं
  3. वसुधा है परिवार, नही है भेद देश का, भरा हुआ अभिमान, सभी में है स्वदेश का, नौ गज के सब पीर, बसे हैं इस दंगल में।
    स्वागत है। आभार ।

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह शास्त्री जी वाह ,
    मजा आ गया

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर है ये अखाडा बधा इस् मंगलमय दंगल के लिये

    जवाब देंहटाएं
  6. vastav men internet ka jaadoo aisa hi hota hai.
    achcdhha bandha hai.
    badhai.

    जवाब देंहटाएं
  7. उड़नतश्तरी सा समीर, बहता जाता है, शिकवे और शिकायत भी, सहता जाता है, प्रीत-रीत-मनुहार बसी है, इस दंगल में।


    bahut sahi........


    yeh dangal dekh ke achcha laga........

    जवाब देंहटाएं
  8. आप ने तो इस दंगल को भी मंगल सा बना दिया बहुत सुंदर कविता कही.
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  9. उड़नतश्तरी सा समीर, बहता जाता है, शिकवे और शिकायत भी, सहता जाता है, प्रीत-रीत-मनुहार बसी है, इस दंगल में।
    ab dangal kahan hai sab mangal hi mangal hai..
    acchi lagi aapki rachna..

    जवाब देंहटाएं
  10. बहुत ख़ूबसूरत कविता लिखा है आपने!

    जवाब देंहटाएं

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