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गुरुवार, 24 सितंबर 2009

‘‘शेर गढ़ने का मन ही नही है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


"कव्वाली"


शर्मसारी में दिन सारा बीता,

लिखने-पढ़ने का मन ही नही है।


खूब हंगामा सा मच रहा है,

गीत रचने का मन ही नही है।


अब तो मैया की याद आ गई है,

इश्क करने का मन ही नही है।


प्रातः की ऊर्मियों ने झिंझोड़ा,

मेरा मिलने का मन ही नही है।


दिल के अरमान सब सो गये हैं,

अब सँवरने का मन ही नही है।


हमको हुन्गामा ने है डराया,

वार करने का मन ही नही है।


एक हमले ने ताकत है छीनी,

लड़ने-भिड़ने का मन ही नही है।


आशिकी मिल गई खाक में सब,

शेर गढ़ने का मन ही नही है।

18 टिप्‍पणियां:

  1. मन हो न हो शायर शेर गढेगा ही. और देखिये आपने तो शेर गढ भी दिया.

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  2. मगर कब तक, क्या एक साहित्यकार कलम किताब किनारे रख कभी चुप बैठ सकता है ?

    जवाब देंहटाएं
  3. itni udas batein mat kijiye..........aapke prashansak ruswa ho jayenge.aap to beman se bhi likhenge to bhi nayab hoga.jaise ab likha hai aur nayab likha hai.

    जवाब देंहटाएं
  4. मयम्क जी मन के बिना ही इतने शेर घद लिये अगर मन होता तो क्या होता? बहुत सुन्दर आभार्

    जवाब देंहटाएं
  5. मयम्क जी मन के बिना ही इतने शेर घद लिये अगर मन होता तो क्या होता? बहुत सुन्दर आभार्

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर सर लिखने की ताकत तो आपसे मिलती है आभार

    जवाब देंहटाएं
  7. वाह डा0 साहिब क्या कह गए, मज़ा आ गया पढ़ कर

    जवाब देंहटाएं
  8. ओह ,मगर राहत यही है की ऐसी मनस्थितियाँ स्थाई नहीं होतीं !

    जवाब देंहटाएं
  9. आपने सामयिक बात को बडी ही सटीकता और
    काव्यात्मक ढंग से रखा है. सिर्फ़ अफ़्सोस ही जाहिर किया जा सकता है. यहां सही को सही कहना अपनी इज्जत खराब करवाना है इस लिये हम तो चुप ही रहेंगे.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  10. कव्वाली से अच्छे व्यंग्य-बाण मारे हैं!

    जवाब देंहटाएं
  11. bahut sundar , aaj to mai hindi likhane me asarmarh hu maaf kariyega

    जवाब देंहटाएं
  12. एक हमले ने ताकत है छीनी,

    लड़ने-भिड़ने का मन ही नही है।


    आशिकी मिल गई खाक में सब,

    शेर गढ़ने का मन ही नही है।

    बहुत शानदार...

    जवाब देंहटाएं
  13. 'हमको हुन्गामा ने है डराया,वार करने का मन ही नही है।
    एक हमले ने ताकत है छीनी,लड़ने-भिड़ने का मन ही नही है।'


    हमे तो यह पता था कि डर तो शर्माजी गए थे ??

    जवाब देंहटाएं
  14. मन नहीं था शेर गढ़ने का लीजिए पूरी नजम ही तैयार कर दी।

    जवाब देंहटाएं
  15. मुझे तो इस बात पर आश्चर्य लग रहा है आखिर मुझ पर ऐसा घिनौना इल्ज़ाम क्यूँ लगाया गया? मैं भला अपना नाम बदलकर किसी और नाम से क्यूँ टिपण्णी देने लगूं? खैर जब मैंने कुछ ग़लत किया ही नहीं तो फिर इस बारे में और बात न ही करूँ तो बेहतर है! आप लोगों का प्यार, विश्वास और आशीर्वाद सदा बना रहे यही चाहती हूँ!
    हंगामे को लेकर आपने बिल्कुल सठिक रचना लिखा है!

    जवाब देंहटाएं
  16. बहुत ही बढ़िया रचना..बधाई,,
    हमने बड़े बड़े हंगामे देखे..पर सामना करते गये..कवि की कलम हमेशा चलती रहती है..

    अब तो आदत सी हो गयी है हंगामे की,
    जब से इस धरती पर आएँ हुए हैं,
    हंगामे की बारिश से बचना बड़ा ही मुश्किल है,
    चारो ओर काले बादल छाएँ हुए है.

    जवाब देंहटाएं
  17. शर्मसारी में दिन सारा बीता,लिखने-पढ़ने का मन ही नही है।
    खूब हंगामा सा मच रहा है,गीत रचने का मन ही नही है।

    yeh baat ekdum sahi kah rahe hain aap......... mera bhi ajkal rachne ka man nahi ho raha hai.......


    हमको हुन्गामा ने है डराया,वार करने का मन ही नही है।

    हुन्गामा ne humko bhi daraya hai.........
    par yeh हुन्गामा nahi hai......... yeh हंगामा hai........ jisne bhi likha hai हुन्गामा wo kuch zaroorat se zyada hi angrez hai......

    ab mujhe is हुन्गामा pe bhi research karna padega........



    bahut hi shaandaar.......


    Dhanyawaad.........


    saadar namaskar....... va

    charansparsh......

    जवाब देंहटाएं

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