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शनिवार, 19 सितंबर 2009

‘‘इस जालिम जमाने में’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


छलक जाते हैं अब आँसू, गजल को गुनगुनाने में।

नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।


नदी-तालाब खुद प्यासे, चमन में घुट रही साँसें,

प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में।

नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।


हुए बेडौल तन, चादर सिमट कर हो गई छोटी,

शजर मशगूल हैं अपने फलों को आज खाने में।

नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।


दरकते जा रहे अब तो, हमारी नींव के पत्थर,

चिरागों ने लगाई आग, खुद ही आशियाने में।

नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।


लगे हैं पुण्य पर पहरे, दया के बन्द दरवाजे,

दुआएँ कैद हैं अब तो, गुनाहों की दुकानों में।

नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।

20 टिप्‍पणियां:

  1. नदी-तालाब खुद प्यासे, बदन में घुट रही साँसें,

    प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में।

    सुन्दर रचना शास्त्री जी !!

    जवाब देंहटाएं
  2. नदी-तालाब खुद प्यासे, चमन में घुट रही साँसें,

    प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में।

    वाह ! बहुत खूब, अति सुन्दर !!

    जवाब देंहटाएं
  3. दरकते जा रहे अब तो, हमारी नींव के पत्थर,चिरागों ने लगाई आग, खुद ही आशियाने में।नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।

    kitna sahi likha hai...........bahut badhiya.

    जवाब देंहटाएं
  4. प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में।

    नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।


    दरकते जा रहे अब तो, हमारी नींव के पत्थर,चिरागों ने लगाई आग, खुद ही आशियाने
    मयक जी लाजवाब रचना है बधाई

    जवाब देंहटाएं
  5. दरकते जा रहे अब तो, हमारी नींव के पत्थर,
    चिरागों ने लगाई आग, खुद ही आशियाने में।
    बहुत सुन्दर भाव
    क्या खूब लिखा है

    जवाब देंहटाएं
  6. लगे हैं पुण्य पर पहरे, दया के बन्द दरवाजे,दुआएँ कैद हैं अब तो, गुनाहों की दुकानों में।नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।
    आभार ।

    जवाब देंहटाएं
  7. दरकते जा रहे अब तो, हमारी नींव के पत्थर,

    चिरागों ने लगाई आग, खुद ही आशियाने में।

    नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।

    ab ek hi shabd kahunga.... ki bahut hi achchi hai..... apki rachnayen dil ko choo le letin hain....

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत सुंदर फोटो लगाया आपने .. और रचना के बारे में क्‍या कहना .. वो तो लाजबाब रहती ही है !!

    जवाब देंहटाएं
  9. "नदी-तालाब खुद प्यासे, चमन में घुट रही साँसें,
    प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में।
    नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।"
    क्या खूब कही है, इतनी अच्छी रचना के लिए बधाई.

    जवाब देंहटाएं
  10. नदी-तालाब खुद प्यासे, चमन में घुट रही साँसें,
    प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में।
    नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।

    बहुत खूब.अच्छी सुन्दर रचना के लिए बधाई.

    जवाब देंहटाएं
  11. बहुत सुन्दर रचना । आभार ।

    जवाब देंहटाएं
  12. शास्त्री जी,
    क्या कहूँ, कितना कहूँ, जो भी कहूँ, वह कम है |
    आपकी रचना में कोई नुक्स निकालूँ , इतना कहाँ मुझ में दम है ??
    आप लिखते रहे युही सदा , आप रचते रहे युही सदा , यह दुआ है मेरी,
    दिल से लिखने वालो की तादाद आज वैसे भी कम है !!

    बहुत बहुत बधाईयां व शुभकामनाएं |

    जवाब देंहटाएं
  13. बहुत अच्छी पोस्ट है। बहुत-बहुत बधाई। नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें..........

    जवाब देंहटाएं
  14. शास्त्रीजी,
    'दरकते जा रहे अब तो, हमारी नींव के पत्थर,
    चिरागों ने लगाई आग, खुद ही आशियाने में।'
    बहुत खूब कहा है आपने. हर अशार मन को छूता है. आज के समय का सत्य देखकर जो चुभन होती है, उसका सच्चा बयान है ये ग़ज़ल ! चाहता हूँ, मेरी प्रसन्नता और युग-बोध की पीडा--दोनों आप तक पहुंचे; रचना की सफलता की प्रसन्नता और इस ग़ज़ल के माध्यम से बख्शी हुई वेदना !!
    हाँ, ये रेखांकित करना चाहता हूँ कि आपकी पिछले दिनों पोस्ट की हुई रचाएं फ्रेम-मंडित होने के कारण मैं पढ़ नहीं सका, फलतः कुछ लिख न सका ! सादर-- आ.

    जवाब देंहटाएं
  15. इतना ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने कि मैं शब्दहीन हो गई! सही में शास्त्री जी आपकी रचनाओं का जवाब नहीं! बहुत खूब!

    जवाब देंहटाएं
  16. छलक जाते हैं अब आँसू, गजल को गुनगुनाने में।
    नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।


    वाह वाह !!

    जवाब देंहटाएं
  17. छलक जाते हैं अब आँसू, गजल को गुनगुनाने में।नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।। waaqai mein is zamaane mein chain ......... aaraam nahi hai..........


    bahut hi oomda poem.........

    जवाब देंहटाएं

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