शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

बालकविता "आयी रेल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 
धक्का-मुक्की रेलम-पेल।
आयी रेल-आयी रेल।।
 
इंजन चलता सबसे आगे।
पीछे -पीछे डिब्बे भागे।।

हार्न बजाताधुआँ छोड़ता।
पटरी पर यह तेज दौड़ता।।
 
जब स्टेशन आ जाता है।
सिग्नल पर यह रुक जाता है।।

जब तक बत्ती लाल रहेगी।
इसकी जीरो चाल रहेगी।।

हरा रंग जब हो जाता है।
तब आगे को बढ़ जाता है।।
 
बच्चों को यह बहुत सुहाती।
नानी के घर तक ले जाती।।

सबके मन को भाई रेल।
आओ मिल कर खेलें खेल।।

धक्का-मुक्की रेलम-पेल।
आयी रेल-आयी रेल।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. मनभावन बाल कविता । रेल रेल बचपन में बहुत खेला है ।

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  2. बहुत प्यारी कविता..उड़ा के बचपन तक ले गई..

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  3. वाह👌👌👌 सुंदर बाल कविता 🙏🙏

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  4. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (२७-०२-२०२१) को 'नर हो न निराश करो मन को' (चर्चा अंक- ३९९०) पर भी होगी।

    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    अनीता सैनी

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  5. बालमन की बहुत सुंदर कविता

    सादर

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  6. रेल ! अद्भुत आविष्कार जिसने आबालवृद्ध को अपने मोहपाश में लपेट रखा है

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  7. बहुत सुंदर प्यारा सा बाल गीत
    नमन आदरणीय 🙏

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  8. वाह सुंदर बाल गीत मोहक ।
    देखो देखो आई रेल...
    बचपन की स्मृति।

    जवाब देंहटाएं

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