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रविवार, 5 अप्रैल 2009

"आराधना किस काम की।" (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


आस्था ही जब नही, आराधना किस काम की।

क्यों लिए फिरता है माला, वन्दना के नाम की।।


कल्पनाओं की डगर में, अटकना अच्छा नही,

भावनाओं के नगर में, भटकना अच्छा नही,

स्वार्थ के संसार में है, कामना किस काम की।

क्यों लिए फिरता है माला, वन्दना के नाम की।।


स्वप्न जो मन में सजे थे, वो अचानक सो गये,

प्यार के क्षण जो बचे थे, वो भयानक हो गये,

हों जहाँ दुर्-भावना, सद्-भावना किस काम की।

क्यों लिए फिरता है माला, वन्दना के नाम की।।


जिन्दगी में, मैं अमावस सा, अन्धेरा पा रहा,

चार दिन की चाँदनी के, कर्ज को लौटा रहा,

श्राद्ध, तर्पण के बिना, है साधना किस काम की।

क्यों लिए फिरता है माला, वन्दना के नाम की।।




11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर गीत है।बधाई स्वीकारें।

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  3. जिन्दगी में, मैं अमावस सा, अन्धेरा पा रहा हूँ।
    चार दिन की चाँदनी के, कर्ज को लौटा रहा हूँ।
    श्राद्ध, तर्पण के बिना, है साधना किस काम की।
    क्यों लिए फिरता है माला, वन्दना के
    bahut khubsurat bhav liye sunder rachana badhai

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर भाव ... रचना अच्‍छी लगी।

    जवाब देंहटाएं
  5. bahut hi behtrin ..............aastha hi nhi ,jab aradhan kis kaam ki............in panktiyon mein hi poora sansar chipa hai kyunki vishwas mein hi sab kuch hai.

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत ही सुंदर रचना. शुभकामनाएं.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  7. क्या बात है,जितनी तारीफ़ की जाये कम होगी।

    जवाब देंहटाएं
  8. आस्था हो जब,
    तभी आराधना करना!
    वंदना के नाम की
    माला तभी जपना!

    अन्यथा भटकाव
    होगा ही निरर्थक!
    साधना के बन
    न पाओगे समर्थक!

    जवाब देंहटाएं
  9. क्यूँ लिए फिरता है माला वंदना के नाम की ...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं

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