"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

"वो छन्द सुनाना ना भूली, मैं गीत बनाना भूल गया।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


वो प्रीत निभाना ना भूली,

मैं रीत निभाना भूल गया।

वो छन्द सुनाना ना भूली,

मैं गीत बनाना भूल गया।।


शब्दों से जब बतियाता हूँ,

अनजाने में लिख जाता हूँ,

वो स्वप्न सजाना ना भूली,

मैं मीत बनाना भूल गया।

वो प्रीत निभाना ना भूली,

मैं रीत निभाना भूल गया।।


मन जब पागल हो जाता है,

उलझन में जब खो जाता है,

वो पथ दिखलाना ना भूली,

मैं दीप जलाना भूल गया।

वो प्रीत निभाना ना भूली,

मैं रीत निभाना भूल गया।।


वो संग सुमेधा सी रहती,

मस्तक में मेधा सी रहती,

वो हार बनाना ना भूली,

मैं जीत मनाना भूल गया।

वो प्रीत निभाना ना भूली,

मैं रीत निभाना भूल गया।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. मन जब पागल हो जाता है,

    उलझन में जब खो जाता है,

    वो पथ दिखलाना ना भूली,

    मैं दीप जलाना भूल गया।
    bahut khubsurat,aapki har rachana ein shabalankar bade sunder hote hai,jaise saare lafz kalam ki dhun par kaagaz par bajte ho.atisnder.

    उत्तर देंहटाएं
  2. वो संग सुमेधा सी रहती,
    मस्तक में मेधा सी रहती,
    वो हार बनाना ना भूली,
    मैं जीत मनाना भूल गया
    शानदार रचना .........लाजवाब ख्याल.............सुन्दर लय.......geet की तरह मस्त है ............दिल को छु गयी

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर
    आपके इस गीत से बहुत कुछ स्मृति में ताज़ा हो गया. जिन्दगी को घसीटने की इस जद्दोज़हद में कुछ चेहरे न मालूम कब और कहाँ छूट गए. आपने एक पंक्ति से ही उन्हें फिर याद करा diya. bahut khoob.

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर गीत,सरल शब्दावली.गुनगुनाते भाव.

    उत्तर देंहटाएं
  5. एक एक पद दाद देने लायक है. साधुवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  6. मैं दीप जलाना भूल गया।
    वो प्रीत निभाना ना भूली,

    वाह डाक्टर साहब, जब जिंदगी मे ऐसे संगी साथी मिल जाये तो फ़िर क्या कहने? बहुत बढिया जी.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  7. वो पथ दिखलाना ना भूली,
    मैं दीप जलाना भूल गया।

    बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  8. तुमने प्रिय गीत रचा मन से!
    मनमीत बसा इसको मन में,
    मनमीत बनाना भूल गया!
    क्या याद रहा? क्या भूल गया?
    मैं तो बतियाना भूल गया!

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह मयंक जी...सुंदर कोमल और एक्दम सामान्य शब्दों में मनमोहक गीत

    एकदम से गुनगुनाने लायक

    उत्तर देंहटाएं
  10. kya kahun.........bahut hi laybaddh,dil ko choo lene wala geet tach diya aapne to.
    kuch alag hi ahsaas liye hai ye geet............preet ka har rang dikha diya ismein to aapne.preet aise bhi to nibhayi jati hai.

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails