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शनिवार, 18 अप्रैल 2009

‘‘प्रश्न चिह्न ???’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जो छन्द तलाश रहे इसमें, वो गहरे घावों को देखें।


जो बन्द तलाश रहे इसमें, वो केवल भावों को देखें।।



जब धर्म-मजहब की चक्की में, मानवता पिसती जाती है।


जब पत्थर पर दानवता, नकली चन्दन घिसती जाती है।।



क्यों शेर सभी बिल्ले बन जाते, जब निर्वाचन आता है।


क्यों खूनी पंजे बाहर आते, हो जब निर्वाचन जाता है।।



क्यों पूरी सजा नही मिलती, इन संसद के मतवालों को।


क्यों समयचक्र चलता जाता है, अपनी वक्र कुचालों को।।



जो रचना करती, पाठ-पढ़ाती, आदि-शक्ति ही नारी है।


फिर क्यों अबला जैसे शब्दों की, बनी हुई अधिकारी है।।



प्रश्न-चिह्न हैं बहुत, इन्हें अब हमको शीघ्र हटाना है।


नारी के खोये अस्तित्वों को, फिर भूतल पर लाना है।।


13 टिप्‍पणियां:

  1. सोचने को विवश करती
    सुन्दर रचना.
    ===========
    चन्द्रकुमार

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह शास्त्री जी!
    निर्भीकता से आप अपनी बात
    सरलता से कह जाते हैं ।
    आप बधाई के पात्र हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सोचने को मजबूर करती हुई,
    सरल शब्दों में सुन्दर रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  4. मयंक भैया।
    सुन्दर और सशक्त रचना के लिए बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. शास्त्री जी ! आपकी यह रचना बेहतरीन है। साफगोई से लिखने के लिए मुबारकवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपके प्रश्न सोचने को मजबूर कर देते हैं। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  7. Bade bhai ,
    sundar bhav. badhaai.
    जो रचना करती,पाठ-पढ़ाती,आदि-शक्ति ही नारी
    है।
    फिर क्यों अबला जैसे शब्दों की,बनी हुई अधिकारी है।।

    उत्तर देंहटाएं
  8. मै उमर और तजुर्बे में आप से छोटा हूँ बस यही बोलूँगा की ग़ज़ब की रचना हैं

    उत्तर देंहटाएं
  9. सुन्दर शब्दों में बाँधी हुयी शशक्त रचना.........बहूत कुछ कहती हुयी

    उत्तर देंहटाएं
  10. सुन्दर शब्दों में बाँधी हुयी शशक्त रचना.........बहूत कुछ कहती हुयी

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत सुन्दर रचना है।बधाई स्वीकारें।

    उत्तर देंहटाएं

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