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मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

"फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


तन, मन, धन से हमको, भारत माँ का कर्ज चुकाना है।


फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।



राम-कृष्ण, गौतम, गांधी की हम ही तो सन्तान है,


शान्तिदूत और कान्तिकारियों की हम ही पहचान हैं।


ऋषि-मुनियों की गाथा को, दुनिया भर में गुंजाना है।


फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।



उनसे कैसा नाता-रिश्ता? जो यहाँ आग लगाते हैं,


हरे-भरे उपवन में, विष के पादप जो पनपाते हैं,


अपनी पावन भारत-भू से, भय-आतंक मिटाना है।


फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।



जिनके मन में रची बसी, गोरों की काली है भाषा,


ये गद्दार नही समझेंगे, जन,गण, मन की अभिलाषा ,


हिन्दी भाषा को हमको, जग की शिरमौर बनाना है।


फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।



प्राण-प्रवाहक, संवाहक हम, यही हमारा परिचय है,


हम ही साधक और साधना, हम ही तो जन्मेजय हैं,


भारत की प्राचीन सभ्यता, का अंकुर उपजाना है।


फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।



वीरों की इस वसुन्धरा में, आयी क्यों बेहोशी है?


आशाओं के बागीचे में, छायी क्यों खामोशी है?


मरघट जैसे सन्नाटे को, दिल से दूर भगाना है।


फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।



7 टिप्‍पणियां:

  1. वीरों की इस वसुन्धरा मे
    छाई क्यों उदासी है------बहुत ही सुन्दर भाव हैंबहुत बहुत बधाई आज ऐसी ही भावना की जरूरत है

    उत्तर देंहटाएं
  2. मन में
    नवीन आशाओं का
    संचार करनेवाला
    प्रेरक देशगान!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही प्रेरणादायक और नव आशा का संचार करती रचना है. शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  4. मयंक जी,
    इस तरह की आदर्शवादी रचनाएँ पढ़ कर लोग आप को साधुवाद देंगे। लेकिन आज यथार्थ की आवश्यकता है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आज भारत ही विदेशों की इतनी नकल कर रहा है ...भूल गया है अपनी संस्‍कृति ... अपनी पहचान को ... आपकी आशावादी रचना जरूर आश्‍वस्‍त कर रही है कि ... कल बेहतर आएगा।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आशा का नया दीप जलाया है आपने,उम्मीद है कि इसकी रौशनी सारे देश मे फ़ैलेगी।

    उत्तर देंहटाएं
  7. bahut hi badhiya likha hai aur logon ko jagane ke liye prerit karti kavita.

    उत्तर देंहटाएं

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