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सोमवार, 27 अप्रैल 2009

"मैं तब-तब पागल होता हूँ।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जब मन्दिर-मस्जिद जलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।

जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।


त्योहारों की परम्परा में, दीन-धर्म को लाये,

दंगों के शोलों में, जम कर पैट्रोल छिड़काये,

जब भाषण आग उगलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।

जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।


कूड़ा-कचरा बीन-बीन जो, रोजी कमा रहे हैं,

पढ़ने-लिखने की आयु में, जीवन गँवा रहे हैं,

जब भोले बचपन ढलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।

जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।


दर्द-दर्द है जिसको होता, वो ही उसको जाने,

जिसको कभी नही होता, वो क्या उसको पहचाने,

जब सर्प बाँह में पलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।

जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. दर्द-दर्द है जिसको होता, वो ही उसको जाने,

    जिसको कभी नही होता, वो क्या उसको पहचाने,

    जब सर्प बाँह में पलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।

    जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

    sarahniya rachna ke liye badhai.

    जवाब देंहटाएं
  2. आपके पागलपन में
    हम भी
    पूरी तरह से
    शामिल हैं!

    जवाब देंहटाएं
  3. जूते-चप्पलों के चलने से लगता है की जनता भी पागल हो गयी है ...वर्त्तमान परिपेक्ष्य में आपने बहुत सटीक बात लिखी है

    जवाब देंहटाएं
  4. सुन्दर समसामयिक रचना / जूते के मामले में ख़ुशी से कि दुःख से...?
    devil's moral

    जवाब देंहटाएं
  5. सामयिक एवं संदर्भित रचना
    - विजय

    जवाब देंहटाएं
  6. दर्द-दर्द है जिसको होता, वो ही उसको जाने,

    जिसको कभी नही होता, वो क्या उसको पहचाने,

    जब सर्प बाँह में पलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।

    जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

    बहुत खूब.....!!

    जवाब देंहटाएं
  7. एक अच्छी सामयिक रचना है।बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  8. आदरणीय शास्त्रीजी

    आप मुम्बई टाईगर पर पधारे व बनामी टीपणीकार की खबर ली मुझे अच्छा लगा-आपका आभार

    शास्त्रीजी हॉलाकि मेरे इस ब्लोग पर मोडर्टर सिस्टम लगा हुआ है कि टीपणी को रोक सकता था पर यह मुझे इसमे सन्तुष्टी का अनुभव नही होता। जब आप जैसे वरिष्ट ब्लोगर हमारे साथ है तो हम और भी सत्यता के लिऐ लडने को ताकत हासील कर लेते है।

    मुझे व्यक्ति विशेष से कोई नाराजगी नही उसके तरीके से खफा हू। यह टीपणी अगर वह नाम से भी करता तो मै ग्रहण करता।

    एक बार फिर से आपका शुक्रिया।

    विशेष इस बहाने आपए ब्लोग पर आना हो गया उच्चारण पर आपकी कविता पाठो को देखा मन को ताकत मिल गई ।

    आपका

    हे प्रभु यह तेरापन्थ

    मुम्बई टाईगर का

    जय जिनेन्द्र।

    राम राम

    जवाब देंहटाएं
  9. दर्द है, जिसको होता वो ही उसको जाने.....
    वाह क्या बात है.......बधाई..

    जवाब देंहटाएं
  10. aaj ke sandarbh par satik baithti hai.........bahut hi prashansniya.

    जवाब देंहटाएं

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