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शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

"राष्ट्र-संघ में हिन्दी मे भाषण करना होगा।" प्रस्तुति-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

श्री मदन ‘विरक्त’ के साथ वार्ता करते हुए डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

प्रख्यात हिन्दी साहित्यकार, कवि व सम्पादक श्री मदन ‘विरक्त’ लोक-सभा के प्रत्याशियों और मतदाताओं से मिलने के लिए 20 अप्रैल से 26 अप्रैल तक पीलीभीत, खटीमा, सितारगंज, किच्छा, टनकपुर के प्रवास पर हैं।


इनकी प्रवास यात्रा एक मात्र उद्देश्य है कि केवल उसी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करना है। जो यह संकल्प ले कि संसद में जाकर वह राष्ट्र-भाषा हिन्दी को उसका उचित स्थान दिलवायेगा। इसके लिए श्री मदन ‘विरक्त’ प्रत्याशियों से जन सम्पर्क मे संलग्न हैं।


इस अभियान में वह मतदाताओं से भी संकल्पपत्र भरवा रहे हैं। मैं साहित्य शारदा मंच का अध्यक्ष होने और माँ-भारती का सेवक होने के नाते इस अभियान में इनके पूरी तरह से साथ हूँ।


मूल मन्त्र यह है कि भारत की राष्ट्र-भाषा हिन्दी जिस दिन जन-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो जायेगी। उस दिन भारत स्वतः ही विश्व में अपना गौरवशाली स्थान प्राप्त कर लेगा। इसके लिए राष्ट्र-संघ में हमारे नेताओं को हिन्दी मे भाषण करना होगा।


यह तभी सम्भव है जबकि संसद में ऐसे प्रत्याशी जीत कर जायें। जो हिन्दी के प्रबल समर्थक हों।

3 टिप्‍पणियां:

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