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मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

‘‘घर पर मान, तो बाहर भी सम्मान’’ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’


आज कबाड़ी को बेचने के लिए रद्दी छाँट रहा था।

उसमें न जाने कितने दशक पुरानी कापी का एक पन्ना मिला।

उसमें मेरी यह रचना लिखी हुई थी। आप भी पढें-


यदि

‘‘घर पर मान,

तो बाहर भी सम्मान’’

बहुत पुरानी है

यह उक्ति,

परन्तु

मुझे लगती है,

वेद जैसी ही एक सूक्ति,


घर पर दाल,

तो बाहर भी दाल,

और

यदि घर पर कंगाल,

तो बाहर भी

हर वस्तु का अकाल,


हमारी राष्ट्र-भाषा हिन्दी,

भारत-माता के माथे की बिन्दी,

जब अपने ही घर में उपेक्षित है,

तो बाहर वालों से,क्या अपेक्षित है?

24 टिप्‍पणियां:

  1. waah ..kya baat kah di aapne to.sach aaj halat to yahi hai hamari rashtriya bhasha ke.ek katu satya ko ujagar kiya hai aapne.dhanyavaad.

    जवाब देंहटाएं
  2. हमारी राष्ट्र-भाषा हिन्दी,
    भारत-माता के माथे की बिन्दी,
    जब अपने ही घर में उपेक्षित है,
    तो बाहर वालों से,क्या अपेक्षित है?

    बिल्कुल सही कहा आपने.. हिन्दी भाषा वाकई उपेक्षित होती जा रही है..

    जवाब देंहटाएं
  3. हौसला अफजाई की टिप्पणियों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद
    बस आपके ब्लॉग को पढ़ पढ़ कर लौट जाती रही , टिप्पणी देने की सामर्थ्य मुझमे नहीं है , वैसे भी जिन ब्लोग्स पर बहुत टिप्पणियाँ पहले से ही आ चुकी हों ,मैं समझती हूँ उन्हें मेरी टिप्पणी की जरुरत नहीं , आप तो टिप्पणी भी कविता में लिखते हैं ,आपकी पोस्ट की तारीफ़ भी कैसे की जाए ! आप हर विषय पर छंद सुना सकते हैं |
    आज की पोस्ट भी थोड़े में बहुत कुछ कह गई है |

    ये बताइए कि आपने टिप्पणियों को साईड बार में कैसे डाला है , जो ब्लॉग खोलते ही दिखने लगती हैं | धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  4. MAYANK JI.
    AAPNE KABADE MEN SE RATN NIKAAL KAR ISKO BLOG PAR PRAKASHIT KIYA HAI.
    BADHAI.

    जवाब देंहटाएं
  5. शास्त्री जी।
    अच्छी कविता के लिए,
    मुबारकवाद।

    जवाब देंहटाएं
  6. SHSTRI JI!
    AAP HAR VIDHA MEN SAFALATA SE LIKHTEN HAIN.
    YE KAVITA BHI BAHUT ACHHI HAI,
    BADHAYEE.

    जवाब देंहटाएं
  7. SHSTRI JI!
    AAP HAR VIDHA MEN SAFALATA SE LIKHTEN HAIN.
    YE KAVITA BHI BAHUT ACHHI HAI,
    BADHAYEE.

    जवाब देंहटाएं
  8. आपने तो अपनी ही बात को गलत साबित कर दिया....देखिये जिस कविता को आपके घर इतने दिनों से मान नहीं मिला था ....आज kitana मान मिल रहा है.......!!

    जवाब देंहटाएं
  9. मयंक जी,

    आपकी लगभग हर पोस्ट पर
    टिप्पणी करनेवाली वंदना जी के भेजे में
    जिस पल यह बात फँस जाएगी,
    उस पल मैं यह मान लूँगा
    कि आपका लिखना
    और
    उनका टिप्पणी करना
    सफल हो गया!

    जवाब देंहटाएं
  10. अक्सर ऐसा ही होता है... कविताएँ पाठक चाहती हैं।

    जवाब देंहटाएं
  11. जब कबाड़ में से ऐसी रचनाएं निकलें तो.................और क्या कहें..........आपके लेखन के आगे मिझे टिप्पणियों के लिए भी शब्द नहीं मिलते।

    जवाब देंहटाएं
  12. जब कबाडखाने मे ऐसा माल निकल रहा है तो असली गोदाम खुलने पर तो नायाब हीरे मोती ही मिलेंगे.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  13. रद्दी बेचने से पहले और एक बार और खंगाल लें , शायद और भी मसाला छुपा हो। अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा।

    जवाब देंहटाएं
  14. mr ravi
    pahle apna likhna to sikh lijiye tab jakar doosre ko kuch kahiye.
    aap to khud apna blog doosre ki cheejon se sajate hain.
    pahle wo soch apne mein paida kijiye.
    hum to jaise hain vaise hi hain agar aapko takleef hoti hai to aankhein band kar lijiye.
    mat aaiye hamare blog par.koi zabardasti to nhi hai na.
    magar kam se kam insaniyat ke gur to jaroor sikh lijiye.
    are doosron ke saman se apna ghar sajane wale kabhi kisi aur ke bare mein aisa nhi kaha karte.

    aapko kuch kehna to nhi chahti thi ,kafi baar ignore kiya.
    phir socha ek baar aapko bhi aaina dikha hi dena chahiye.

    जवाब देंहटाएं
  15. वंदना जी,

    मैं आपकी किसी भी बात का
    बुरा नहीं मान रहा हूँ!

    आपको कहने का पूरा हक़ है!
    गुस्से में ही सही,
    पर आपने कह डाला -
    यह बात मुझे अच्छी लगी!

    लेकिन इतना तो मैं अब भी कहूँगा
    कि अगर आपने
    इससे कई गुना गुस्सा मुझ पर
    अँगरेज़ी (रोमन लिपि) की जगह
    हिंदी (देवनागरी लिपि) में
    लिखकर उतारा होता,
    तो आपका हिंदी-लेखन
    थोड़ा-सा तो सुधर ही जाता
    और यह बात मुझे ही नहीं,
    अन्य कई साथियों को भी
    बहुत अच्छी लगती!

    अँगरेज़ी में लिखकर तो
    आपने मेरी बात को सही सिद्ध कर दिया
    और मेरे द्वारा की गई टिप्पणी
    पहले से ज़्यादा बलवती हो गई!

    जवाब देंहटाएं
  16. रावेंद्रकुमार रवि

    aap ko yae adhikaar kisnae diyaa ki aap vandana yaa kisi ko bhi yae bataaye ki kament kis lipi mae likho

    bahut sae log roman mae is liyae likgtey haen kyuki wo apni jeevika computer par eglish mae kaam kar karkae chalaatey haen

    aur hindi kae samaan kaa matlab yae kab sae hogayaa ko any bhasha mae baat hi naa karo

    apnae maansik daayre viksit karae aur dhayaan dae google ne blog sewa uplabdh karayii hae jo ek gaer bhartiyae company haen
    agar wo bhi aap ki soch ki hotee to shyaad sab blog english mae hi hotey

    afsos haen ki aap is baat par behas kar rahey haen yae jaantey huae bhi ki computer taknik bhi english hee hotee haen

    kewal hindi likhnae sae aur pravachan daenae sae agar hindi ko samaan miltaa to kab kaa mil gayaa hota

    जवाब देंहटाएं
  17. वंदना जी,
    मित्र रवि मानसिक दिवालिया हो चुके हैं, आप इन ओछे और छोटे हड़कत पर ध्यान देने के बजाय अपनी लेखनी के माध्यम से विचार का संवाद करें.
    मेरे मित्र रवि को हिंदी से कोई सरोकार नहीं, हिंद को ये जानते नहीं बस वेब के इस पन्ने से अपने बाबूगिरी से ऊपर आने का प्रयास है इनका.

    बेहतरीन रचना के लिए मयंक जी को आभार.

    क्षुद्र प्रतिक्रया के लिए राघवेन्द्र जी से कोई रोष नहीं अपितु द्रवित

    जवाब देंहटाएं
  18. ravi ji
    maine aapka comment padha aur rachna ji aur rajneesh ji ka bhi.
    mere khyal se ab mujhe kuch kahne ki jaroorat hi nhi rahi.
    maine apna gussa nhi nikala kyunki main gussa nhi hun balki aapki mansikta ke bare mein soch kar mujhe aapko jawab dena pada.
    hum wo bhartiya hain jo apne desh aur apni matribhasha dono ka samman karna jante hain magar sath hi kisi aur desh ki bhasha ka mazak bhi nhi udate.

    dhanyavaad.

    जवाब देंहटाएं
  19. jo kament visahy sae itar ho unko delte kar daene sae ek bahut badaa faydaa hota haen ki log vishay sae itar kaemnt daena band kar daetey haen

    जवाब देंहटाएं
  20. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  21. कॉपी-पेस्ट करके ही सही,
    कम से कम रचना सिंह जी ने
    मेरा नाम तो हिंदी (देवनागरी लिपि) में लिखा - यह देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई
    और दिखाई दी -
    आशा की एक नई किरण!

    अब ज़रा यह भी पढ़कर देखिए -

    "aur hindi kae samaan kaa matlab yae kab sae hogayaa ko any bhasha mae baat hi naa karo"

    रोमन लिपि में लिखी गई अपनी इस हिंदी को देवनागरी लिपि में उच्चरित होते देखिए -

    "और हिंदी काए समान का मतलब यए कब सए होगया को अन्य् भष मए बात हि ना करो"

    अगर आप यह लिखना चाहती थीं -

    "और हिंदी के सम्मान का मतलब यह कब से हो गया कि अन्य भाषा में बात ही ना करो"

    तो ऐसे लिखा जाना था -

    "aur hindee ke sammaan kaa matlab yah kab se ho gayaa ki anya bhaashaa men baat hee naa karo"

    जवाब देंहटाएं
  22. मुझे दूसरों के सामान से अपना घर सजानेवाला कहनेवाली वंदना जी क्या मुझे यह बता पाएँगी कि अपने चेहरे पर किसी और का चेहरा लगानेवाले को क्या कहते हैं?

    ऐश्वर्य राय का चेहरा अपने चेहरे पर लगाकर अंतरजाल पर विचरण करनेवाली वंदना जी और उनके सभी समर्थकों के संज्ञान में यह बात अच्छी तरह से आ जानी चाहिए कि मेरा एकमात्र ब्लॉग "सरस पायस" अंतरजाल पर एक हिंदी साहित्यिक पत्रिका के रूप में जाना जाता है!

    जवाब देंहटाएं

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अपनी भाषा हिन्दी अपनी माटी गीत सुनाती अपनी मुरलिया बना तो अपनी मेहनत से मुकद्दर को बनाना चाहिए अपनी रक्षा का बहन अपनी वाणी मधुर बनाओ अपनी हिन्दी अपनीआजादी अपनीबात अपने छोटे से जीवन में अपने ज़माने याद आते हैं अपने पैर पसार चुका है अपने भारत को करता हूँ शत्-शत् नमन अपने मन को बहलाते हैं अपने वीर जवान अपने शब्दों में धार भरो अपने सढ़सठ साल अपने हिन्दुस्तान की अफजलगुरू अब आ जाओ कृष्ण-कन्हैया अब आँगन में वृक्ष अब इस ओमीक्रोन से अब कागा की काँव में अब कैसे सुधरें हाल सुनो अब गर्मी पर चढ़ी जवानी अब जगत के बन्धनों से मुक्त होना चाहता हूँ अब जम्मू-कश्मीर की ध्वस्त करो सरकार अब जूते के सामने अब झूठे सम्मान अब तक का लोखा जोखा अब तो करो प्रहार अब तो जम करके बरसो अब तो दुआ-सलाम अब तो युद्ध जरूरी है अब न कुठाराघात करो अब नीड़ बनाना है अब पढ़ना मजबूरी है अब पैंतालिस वर्ष अब बसन्त आने वाला है अब बसन्त आयेगा अब भी वीर सुभाष के अब मिट गया वजूद अब मेरे सिर पर नहीं अब हिन्दी की धूम अबकी बार दिवाली में अभिनय करते लोग अमन अमन का सन्देश अमन चाँदपुरी अमन हो गया गोल अमर बारती अमर भारती जिन्दाबाद अमर रहे 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भरे आकाश में आ भी जाओ! आ हमारे साथ श्रम को ओढ़ ना आँखें आँखें कर देतीं इज़हार आँखें कुदरत का उपहार आँखें नश्वर देह का आँखों का उपहार आँखों का दर्पण आँखों के बिन जग सूना है आँखों में होती है भाषा आँचल में है दूध और आँसू आँसू औ’ मुस्कान आँसू का अस्तित्व आँसू की कथा-व्यथा आँसू यही बताते हैं आइना आई चौदस रूप की आई फिर से लोहिड़ी आई फिर से लोहिड़ी आई फिर से लोहिड़ी लेकर नवल उमंग। आई फिर से लोहिड़ी लेकर नवल उमंग। आई फिर से होली आई बसन्त-बहार आई होली आई होली रे आओ अपना धर्म निभाएँ आओ गौतम बुद्ध आओ तिरंगा फहरायें आओ दीप जलायें हम आओ दूर करें अँधियारा आओ पेड़ लगायें हम आओ प्यार की बातें करें आओ मोहन प्यारे आओ आग के बिन धुँआ नहीं होता आग बरसती धरा पर आगत का स्वागत करने में आगरा आगे बढ़ना आसान नहीं आगे बढ़िए-आगे बढ़िए.... आचमन के बिना आचरण आचरण होता नहीं आचार की बातें करें आचार्य देवेन्द्र देव आज अहोई पर्व आज आदमी बौना है आज और कल का भेद आज करवाचौथ पर मन में हजारों चाह हैं आज का नेता आज कुछ उपहार दूँगा आज के परिवेश में आज खिले कल है मुरझाना आज तो मूर्ख भी दिवस है ना आज दिवस प्रस्ताव आज नदारद प्याज आज नीम की छाँव आज पुरवा-बयार आयी है आज फिर बारिश डराने आ गयी आज बरखा-बहार आयी है आज बहनों की हैं ये ही आराधना आज बहुत है शोक आज मेरे देश को सुभाष चाहिए आज रफायल बन गया आज विश्व हिन्दी दिवस आज शाखाएँ बहकी आज शिक्षक दिवस है आज सुखद संयोग आज सुखद-संयोग आज हम खेलें ऐसी होली आज हमारी खिलती बगिया आज हा-हा कार सा है आज हारी है अमावस आज हुई बरसात आज-कल आजाद भारत आजाद हिन्दुस्तान के नारे बदल गये आजादी आजादी अक्षुण्ण हमारी आजादी करती है आज सवाल आजादी का तन्त्र आजादी का तोहफा आजादी का पर्व आजादी का मन्त्र आजादी की वर्षगाँठ आजादी मुझको खलती है आठ दोहे आठ मार्च-आठ दोहे आड़ू आतंक को पाल रहा नापाक आतंकवाद आतंकी आती इन्दिरा याद आते हैं बदलाव आदत में अब चाय समायी आदत है हैवानों की आदमी का चमत्कार आदमी तो आज फिर से ताज पा गया आदमी से अच्छे जानवर आदमी ही बन गये हैं आदिदेव कर दीजिए बेड़ा भव से पार आधा "र्" का प्रयोग आधी आजादी आन-बान आने के ही साथ बँधी है आने वाला है नया साल आने वाला है बसन्त आप सबको मुबारक नया वर्ष हो आपका एहतराम करते हैं आपके बिन मेरी होली सूनी है। आपदा आफत मचाने आ गयी आपस के सम्बन्ध आपस में तकरार आपस में मतभेद आपस में सुर मिलाना आपाधापी आफत की बरसात आफत के परकाले आभार आभारदर्शन आभासी दुनिया आभासी संसार आभासी संसार में आम आम और लीची आम और लीची का उदगम आम के वास्ते अब कहाँ तन्त्र है आम गया है हार आम दिलों में खास आम पिलपिले हो भले आम पेड़ पर लटक रहे हैं आम में ज़ायका नहीं आता आम हो गया खास का आम-नीम बौराये फिर से आमआदमी आमन्त्रण आया नया निखार आया नहीं सुराज आया पास किनारा आया फागुन मास आया बसन्त आया भादौ मास आया मधुमास आया राखी का त्यौहार आया है ऋतुराज आया है त्यौहार ईद का आया है त्यौहार तीज का आया हैं मधुमास आयी रेल आयी सावन तीज आयी है बरसात आयी है शिवरात आयी होली आयी होली-आयी होली आये सन्त कबीर आये हैं शैतान आयेगा इस बार भी नया-नवेला साल आरती आरती उतार लो आरती उतार लो आ गया बसन्त है आराधना आर्य समाज: बाबा नागार्जुन की दृष्टि में आलिंगन उपहार आलिंगन/चुम्बन दिवस आलिंगनदिवस आलू आलूबुखारा आलेख आलोकित परिवेश आल्हा आवश्यक सामान आवश्यक सूचना आवागमन आशा आशा का चमत्कार आशा का दीप जलाया क्यों आशा के दीप जलाओ तो आशा पर उपकार टिका है आशा शैली आशा है आशाएँ मुस्काती हैं आशाएँ विश्वास जगाती आशाओं पर प्यार टिका है आशियाना चाहिए आशीष का आशीष तुम्हें मैं देता आशु-कविता आसमान आसमान का छोर आसमान की झोली से... आसमान के दीप आसमान में आसमान में कुहरा छाया आसमान में छाये बादल आसमान में बादल छाया आस्था-विश्वास आह्वान इंसान बदलते देखे हैं इंसानियत का रूप इंसानी पौध उगाओ इंसानी भगवानों में इक मौन-निमन्त्रण तो दे दो इक शामियाना चाहिए इतनी मत मनमानी कर इतने न तुम ऐंठा करो इनकी किस्मत कौन सँवारे इन्तज़ार इन्दिरा गांधी इन्दिरा! भूलेंगे कैसे तेरो नाम इन्द्र बहादुर सेन इन्द्रधनुष का चौमासे में “रूप” हमें दिखलाते हैं इन्द्रधनुष का रूप हमें दिखलाते हैं इन्द्रधनुष के रंग निराले इन्सानी भगवानों में इबादत इमदाद आयेगी इलज़ाम के पत्थर इल्म रहता पायदानों में इशारे समझना इस जीवन की शाम ढली इस धरा को रौशनी से जगमगायें इस नये साल में ईद ईद और तीज आ गई है हरियाली ईद का चाँद आया है ईद तीज आ गई है हरियाली ईद मनाई जाती है ईद मुबारक़ ईद-दिवाली-होली मिलकर ईमान बदलते देखे हैं ईवीएम में बन्द ईश्वर के आधीन उगता दिल में प्यार उगता है आदित्य उगने लगे बबूल उग्रवाद-आतंक का उच्चारण की सबसे लोकप्रिय प्रविष्टि उच्चारण खामोश उजड़ गया है तम का डेरा उजड़ गया है नीड़ उज्जवल-धवल मयंक उड़ जायें जाने कब तोते उड़ता गर्द-गुबार उड़ता बग़ैर पंख के नादान आज तो उड़ती हुई पतंग उड़तीं हुई पतंग उड़नखटोला द्वार टिका है उड़नखटोला-यान उड़ान उड़ान में प्रकाशित उतना पानी दीजिए जितनी जग को प्यास उतना ही साहस पाया है उत्कर्षों के उच्च शिखर पर चढ़ते जाओ उत्तर अब माकूल उत्तराखण्ड उत्तराखण्ड का पर्व हरेला उत्तराखण्ड का स्थापना दिवस और संक्षिप्त इतिहास उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक धरोहर उत्तराखण्ड के कर्मठ मुख्यमन्त्री उत्तराखण्ड के पर्व हरेला पर विशेष उत्तराखण्ड राज्य स्थापनादिवस उत्तराखण्ड राज्य का स्थापना दिवस उत्तरायणी उत्तरायणी पर्व उत्तरायणी-मकर संक्रान्ति उत्तरायणी-लोहड़ी उत्सव ललित-ललाम उत्सव हैं उल्लास जगाते उद्धव की सरकार उन्मीलन पत्रिका में मेरा एक गीत उन्हें हम प्यार करते हैं उपन्यास सम्राट को उपमा में उपमान उपवन के फूल उपवन मुस्कायेगा उपवन में अब रंग उपवन में हरियाली छाई उपवन” का विमोचन उपसर्ग और प्रत्यय उपहार उपहार में मिले मामा-मामी उपासना में वासना उमड़-घुमड़ कर आये बादल उमड़ा झूठा प्यार उमड़ी पर्वत से जल धारा उम्मीद मत करना उम्र छियासठ साल हो गयी उलझ गया है ताना-बाना उलझ गये हैं तार उलझ रहे हैं तार उलझन-झमेले रहेंगे उलझा है ताना-बाना उलझे हुए सवाल उलझे हुए सवालों में उलूक का भूत उल्फत के ठिकाने खो गये हैं उल्लास का उत्तरायणी पर्व उल्लू और गदहे उल्लू का आतंक उल्लू की परवाज उल्लू की है जात उल्लू जी का भूत उसका होता राम सा उसूल नापता रहा उसूल बाँटता रहा ऋतुएँ तो हैं आनी जानी ऋतुराज ऋतुराज प्रेम के अंकुर को उपजाता ऋषियों की सन्तान ऋषियों की हम सन्ताने हैं ए.पी.जे.अब्दुल कलाम को श्रद्धाञ्जलि एक अशआर एक कविता और एक संस्मरण एक गीत एक गीत-एक कविता एक दिन तो मचल जायेंगे एक दोहा एक ग़ज़ल. झाड़ू की तगड़ी मार एक दोहा और गीत एक नज़्म एक निवेदन एक पुराना गीत एक बालकविता एक मुक्तक एक मुक्तक पाँच दोहे एक रचना एक रहो और नेक रहो एक समय का कीजिए दिन में अब उपवास एक समान विधान से एक हजार एक-विचार एककविता एकगीत एकगीत एकता की धुन बजायें एकल कवितापाठ एकाकीपन एतबार अपने पे कम हैं एतिहासिक विवरण एप्रिलफूल एमिली डिकिंसन एमीलोवेल एला और लवंग एला व्हीलर विलकॉक्स एसी-कूलर फेल ऐ दुलारे वतन ऐतिहासिकआलेख ऐसा करो उपाय ऐसे घर-आँगन देखे हैं ऐसे पुत्र भगवान किसी को न दें ऐसे होगा देश महान ओ जालिम-गुस्ताख ओ बन्दर मामा ओ मेरे मनमीत ओटन लगे कपास ओम् जय शिक्षा दाता ओले ओलों की बरसात ओसामा और अब कितना चलूँगा...? और न अब हिमपात करो कंकड़ और कबाड़ कंकरीट की ठाँव में कंकरीटों ने मिटा डाला चमन कंचन सा रूप कंजूस मधुमक्खी कंस आज घनश्याम हो गये ककड़ी ककड़ी खाने को करता मन ककड़ी बिकतीं फड़-ठेलों पर ककड़ी मौसम का फल अनुपम ककड़ी लम्बी हरी मुलायम ककड़ी-खीरा खरबूजा है कट्टरपन्थी जिन्न कठमुल्लाओं की कटी कठिन झेलना शीत कठिन बुढ़ापा बीमारी है कठिन बुढ़ापा होता है कठिन हो गया आज गुज़ारा कड़ाके की सरदी में ठिठुरा बदन है कड़ी धूप को सहते हैं कड़ुए दोहे कथा कथानक क़दम क़दम पर घास कदम बड़ायेंगे कदम मिला कर चल रहा जीवनसाथी साथ कदम-कदम पर घास कनकइया की डोर तुम्हारे हाथो में कनिष्ठ पुत्र विनीत का जन्मदिन कनेर मुस्काया है कपड़े का पंडाल कब चमकेंगें नभ में तारे कब तक तुम सन्ताप भरोगे? कब तक मौन रहोगे कब बरसेंगे बादल काले कबूतर का घोंसला कभी आकाश में बादल घने हैं कभी उम्मीद मत करना कभी कुहरा कभी न उल्लू तुम कहलाना कभी न करना भंग कभी न करना माफ कभी न टूटे मित्रता कभी भी लाचार हमको मत समझना कभी सूरज कमल कमल के बिन सरोवर पर कमल पसरे है कमल पसरे हैं कमा रहे हैं माल कम्प्यूटर कम्प्यूटर और इंटरनेट कम्प्यूटर और इण्टरनेट कम्प्यूटर और जालजगत कम्प्यूटर बन गई जिन्दगी कम्बल-लोई और कोट से कर दिया क्या आपने कर दो काम तमाम कर दो दूर गुरूर कर लेना कुछ गौर कर लो सच्चा प्यार करके विष का पान करगिल विजय दिवस करता हूँ मैं ध्यान करते दिल पर वार करते श्रम की बात करना ऐसा प्यार करना पूरी मात करना भूल सुधार करना मत कुहराम करना मत दुष्कर्म करना मत हठयोग करना राह तलाश करना सब मतदान करनी-भरनी. काठी का दर्द करने को कल्याण करने बवाल निकले करने मलाल निकले करवा पूजन की कथा करवाचौछ करवाचौथ करवाचौथ पर करें सितम्बर मास में करो आज शृंगार करो तनिक अभ्यास करो पाक को ढेर करो भोज स्वीकार करो मदद हे नाथ करो मेल की बात करो रक्त का दान करो शहादत याद करो सतत् अभ्यास करो साक्षर देश कर्तव्य और अधिकार कर्म हुए बाधित्य कर्मनाशा कर्मों का ताबीज कल की बातें छोड़ो कल हो जाता आज पुराना कल-कल कल-कल शब्द निनाद कलम मचल जाया करती है क़लम मचल जाया करती है कल़मकार लिए बैठा हूँ कलयुग तुम्हें पुकारता कलयुग में इंसान कलेण्डर ही तो बदला कल्पनाएँ निर्मूल हो गईं कल्पित कविराज कवर्ग कवायद कौन करता है कवि कवि और कविता कवि लिखने से डरता हूँ कविगोष्ठी कविता कविता का आकार कविता का आथार कविता का आधार कविता का संयोग कविता को अब तुम्हीं बाँधना कविता क्या है? कविताओँ का मर्म कविता् कवित्त कविधर्म कवियों के लिए कुछ जानकारियाँ कव्वाली कष्ट उठाना पड़ता है कसाब कसाब को फाँसी कह राम और रहीम कहते लोग रसाल कहनेभर को रह गया अपना देश महान कहलाना प्रणवीर कहा कीजिए कहाँ खो गई मीठी-मीठी इन्सानों की बोली कहाँ गयी केशर क्यारी? कहाँ जायें बताओ पाप धोने के लिए कहाँ रहा जनतन्त्र कहाँ है आचरण कहानी कहीं आकाश में बादल घने हैं कहीं है हरा कहें मुबारक ईद कहें सुखी परिवार कहो मुबारक ईद काँटे और गुलाब काँटे और सुमन काँटे बुहार लेना काँटों ने उलझाया मुझको काँधे पर हल धरे किसान काँप रही है थर-थर काया काँव-काँव कौआ चिल्लाया। काँव-काँवकर चिल्लाया है कौआ काँवड़ का व्यतिरेक काक-चेष्टा को अपनाओ कागज की नाव काग़ज़ की नाव कागज की है नाव काठ की हाँडी चढ़ेगी कब तलक काठी का दर्द काने करते राज काम अपना तमाम करते हैं काम कलम का बोलता काम न करना बन्द काम-आराम कामी आते पास कामी और कुसन्त कामुकता का दौर कायदे से जरा चलना सीखो कायदे से धूप अब खिलने लगी है। कार यात्रा कार हमारी हमको भाती कारवाँ कारा उम्र तमाम कारा में सच्चाई बन्द है कार्टूननिस्ट-मयंक खटीमा कार्तिक पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा-गंगा स्नान काल की रफ्तार को छलता रहा हूँ काला अक्षर भैंस बराबर कालातीत बसन्त काले अक्षर काले बादल काव्य (छन्दों) को जानिए काव्य का मर्म काव्यानुवाद काव्यानुवाद-पिता की आकांक्षाएँ.. काश्..कोई मसीहा आये कितना आज सुकून कितनी अच्छी लगती हैं कितनी मैली हो गयी गंगा जी की धार कितनी सुन्दर मेरी काया कितने बदल गये हैं बन्दे कितने सपने देखे मन में किन्तु शेष आस हैं किया बहुत उपकार किये श्राद्ध निष्पन्न किसको गीत सुनाती हो? किसको लुभायेंगे अब किसलय कहलाते हैं किसान किसान-जवान किसे अच्छी नहीं लगती किसे सुनायें गीत किस्मत में लिक्खे सितम हैं कीटनिकम्मे कीर्तिमान सब ध्वस्त कुंठित हुआ समाज कुगीत कुछ अभिनव उपहार कुछ उड़ी हुई पोस्ट कुछ उद्गार कुछ और ही है पेट में कुछ काँटे-कुछ फूल कुछ क्षणिकाएँ कुछ चित्र ‘‘हाइकू’’ में कुछ तो करो यकीन कुछ तो बात जरूरी होगी कुछ दोहे कुछ भी नहीं असली है कुछ भी नहीं सफेद कुछ मजदूरी होगी कुछ शब्दचित्र कुटिल न चलना चाल कुटिल नहीं होते कभी कुटिल-काँटे लड़ाई ठानते हैं कुटिलकाँटे कुटी बनायी नीम पर कुण्ठा कुण्ठा भरे विचार कुण्ठाओं ने डाला डेरा कुण्डलिया कुण्डलियाँ कुण्डलियाँ-चीयर्स बालाएँ कुदरत का उपहार अधूरा होता है कुदरत का कानून कुदरत का हर काज सुहाना लगता है कुदरत की करतूत कुदरत ने फल उपजाये हैं कुदरत ने सिंगार सजाया कुदरत से खिलवाड़ कुन्दन जैसा रूप कुन्दन सा है रूप कुमाऊं के ब्लॉग कुमुद कुम्भ कुम्भ की महिमा अपरम्पार कुर्ता होली खेलता कुर्बानी कुहका कुहरा कुहरा करता है मनमानी कुहरा चारों ओर कुहरा छँटने ही वाला है कुहरा छाया है कुहरा पसरा आज चमन में कुहरा पसरा है आँगन में कुहरे का है क्लेश कुहरे की फुहार कुहरे की मार कुहरे की सौगात कुहासे का आवरण कुहासे की चादर कु्ण्डलिया कूटनीति की बात कूड़ा-कचरा कूर्मा़ञ्चली कविता कूलर कूलर गर्मी हर लेता है कृपा करो अब मात कृषक कृष्ण सँवारो काज कृष्णचन्द्र अधिराज कृष्णचन्द्र गोपाल के बिना केवल कुनबावाद केवल दुर्नीति चलती है केवल यहाँ धनार्थ केवल हिन्दू वर्ष क्यों केशव भार्गव "निर्दोष" की 8वीं पुण्यतिथि केशव भार्गव "निर्दोष" की 8वीं पुण्यतिथि के अवसर पर केसर के फूल केसरिया का रंग कैद कैमरे में करो कैसी है ये आवाजाही कैसे अपना भजन करूँ मैं कैसे आज बचाऊँ कैसे आये स्वप्न सलोना? कैसे उतरें पार? कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं कैसे उलझन को सुलझाऊँ कैसे गुमसुम हो जाऊँ मैं कैसे जान बचाऊँ मैं कैसे देश-समाज का होगा बेड़ा पार कैसे नवअंकुर उपजाऊँ? कैसे नियमित यजन करूँ मैं कैसे नूतन सृजन करूँ मैं कैसे नूतन सृजन करूँ मैं? कैसे पायें पार कैसे पौध उगाऊँ मैं कैसे प्यार करेगा? कैसे फूल खिलें उपवन में कैसे बचे यहाँ गौरय्या कैसे मन को सुमन करूँ मैं कैसे मन को सुमन करूँ मैं? कैसे मिलें रसाल कैसे मुलाकात होती कैसे लू से बदन बचाएँ? कैसे शब्द बचेंगे अपने कैसे साथ चलोगे मेरे? कैसे सेवा-भाव भरूँ कैसे होंगे पार कैसै आये बहार भला कॉफी कॉफी की चुस्की कॉफी की चुस्की ले लेना कॉफी की तासीर निराली कोई बात बने कोई भूला हुए मंजर कोई वादा-क़रार मत करना कोई सोपान नहीं कोटि-कोटि वन्दन तुम्हें कोमल बदन छिपाया है कोयल आयी मेरे घर में कोयल आयी है घर में कोयल का सुर कोयल गाये गान कोयल चहकी कोयल रोती है कानन में कोयलिया खामोश हो गई कोरोना कोरोना का दैत्य कोरोना की बाढ़ कोरोना की मार कोरोना के रोग से कोरोना के साथ कोरोना को हराना है कोरोना वायरस कोरोना से डर रहा सारा ही संसार कोरोना से सारे हारे कोशिश कौआ कौआ होता अच्छा मेहतर कौड़ी में नीलाम मुहब्बत कौन सुखी परिवार कौन सुने फरियाद कौन सुनेगा सरगम के सुर क्या है प्यार क्या है प्यार-रॉबर्ट लुई स्टीवेंसन क्या हो गया है क्या होता है प्यार क्यों देश ऐसा क्यों राम और रहमान मरा? क्यों होता है हुस्न छली क्यों? क्रिकेट विश्वकप झलकियाँ क्रिसमस का त्यौहार क्रिसमस का शुभकामनाएँ क्रिसमस की बधाई क्रिसमस-डे क्रिस्टिना रोसेट्टी की कविता क्रोध क्षणभंगुर हैं प्राण क्षणिका क्षणिका को भी जानिए क्षणिका क्या होती है? क्षणिकाएँ खंजर उठा लिया खटमल-मच्छर का भेद खटीमा खटीमा (उत्तराखण्ड) का पावर हाउस बह गया खटीमा का परिचय खटीमा में आयोजितपुस्तक विमोचन के कार्यक्रम की रपट खटीमा में आलइण्डिया मुशायरा एवं कविसम्मेलन सम्पन्न खट्टे-मीठे और रसीले खतरे में आज सारे तटबन्ध हो गये हैं खतरे में तटबन्ध हो गये हैं खद्योत खद्योतों का निर्वाचन खबर छपी अखबारों मे ख़बरों की भरमार खर-पतवार उगी उपवन में खरगोश खरपतवार अनन्त खरबूजा खरबूजा-तरबूज खरबूजे खरबूजे का मौसम आया ख़ाक सड़कों की अभी तो छान लो खाता-बही है खादी खादी-खाकी खादी-खाकी की केंचुलियाँ खान-पान में शुद्धता खान-पान-परिधान विदेशी फिर भी हिन्दी वाले हैं खानदानों में खाने में सबको मिले रोटी-चावल-दाल ख़ार आखिर ख़ार है खार पर निखार है ख़ार से दामन बचाना चाहिए खारा पानी खारा-खारा पानी खारिज तीन तलाक खाली पन्नों को भरता हूँ खाली हुआ खजाना खास आज भी खास खास को होने लगी चिन्ता खास हो रहे मस्त खिल उठा है इन्हीं से हमारा चमन खिल उठे फिर से बगीचे में सुमन खिल जायेंगे नव सुमन खिल रहे फूल अब विषैले हैं खिलता फागुन आया खिलता सुमन गुलाब खिलता हुआ बसन्त खिलती बगिया है प्रतिपल खिलते हुए कमल पसरे हैं खिलने लगते फूल खिलने लगा सूखा चमन खिला कमल का फूल खिला कमल है आज खिली रूप की धूप खिली सुहानी धूप खिली हुई है डाली-डाली खिले कमल का फूल खिसक रहा आधार खीरा खुद को आभासी दुनिया में झोका खुद को करो पवित्र ख़ुदगर्ज़ी का हुआ ज़माना खुदा की मेहरबानी है खुद्दारों की खुद्दारी खुमानी खुलकर खिला पलाश खुलकर हँसा मयंक खुली आँखों का सपना खुली ढोल की पोल खुली बहस- खुलूस से खुश हो करके लोहड़ी खुश हो रहा बसन्त खुश हो रहे किसान खुशियों का परिवेश खुशियों की डोरी से नभ में अपनी पतंग उड़ाओ खुशियों से महके चौबारा खूब थिरकती है रंगोली खूबसूरत लग रहे नन्हें दिये खेत खेत उगलते गन्ध खेत घटते जा रहे हैं खेती का कानून खेतीहर-मजदूर खेतों ने परिधान बसन्ती पहना है खेतों में झुकी हैं डालियाँ खेतों में शहतूत लगाओ खेतों में सोना बिखरा है खेलते होली मोहनलाल खेलो रंग खो गई इन्सानियत खो गया कहाँ संगीत-गीत खो चुके सब कुछ खोज रहे हैं शीतल छाया खोल दो मन की खिड़की खोलो तो मुख का वातायन ख़्वाब का ये रूप भी नायाब है ख़्वाब में वो सदा याद आते रहे गंगा गंगा का अस्तित्व बचाओ गंगा जी की धार गंगा पुरखों की है थाती गंगा बचाओ गंगा बहुत मनोहर है गंगा मइया गंगा स्नान गंगास्नान गंगास्नान मेला गंजे गगन में छा गये बादल गगन में मेघ हैं छाये गजल गज़ल ग़जल ग़ज़ल ग़जल "शरीफों के घरानों की" ग़ज़ल "ख़ानदानों ने दाँव खेलें हैं" ग़ज़ल "उल्लओं की पंचायतें लगीं थी" ग़ज़ल की परिभाषा ग़ज़ल के उद्गगार ग़ज़ल में फिर से रवानी आ गयी है ग़जल या गीत ग़ज़ल संग्रह ग़ज़ल हो गयी क्या गजल हो गयी पास ग़ज़ल-गुरूसहाय भटनागर बदनाम ग़ज़ल? ग़ज़ल. ईमान आज तो ग़ज़ल. खून पीना जानते हैं ग़ज़ल. जीवन में खुशियाँ लाते हैं ग़ज़ल. दो जून की रोटी ग़ज़ल. पत्थरों को गीत गाना आ गया है ग़ज़लगो स्वयम् को बताने लगे ग़ज़लनुमा कुछ अशआर गज़लिका ग़ज़लिया-ए-रूप से एक नज़्म ग़ज़लियात-ए-रूप ग़ज़लियात-ए-रूप से एक ग़ज़ल ग़ज़लियात-ए-रूप से मेरी एक ग़ज़ल ग़ज़लियात-ए-रूप” की भूमिका गठबन्धन की नाव गढ़ता रोज कुम्हार गणतंत्र महान गणतन्त्र गणतन्त्र दिवस गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएँ गणतन्त्र दिवस पर राग यही दुहराया है गणतन्त्र पर्व पर गणतन्त्र महान गणतन्त्रदिवस गणनायक भगवान गणेश चतुर्थी पर विशेष गणेश वन्दना गणेशवन्दना गणेशोत्सव पर विशेष गणों का छन्दों में प्रयोग गणों की जानकारी गत गदहे गद्दार गद्दारी-मक्कारी गद्दारों को जूता गद्य-गीत गद्य-पद्य गद्यगीत गधा हो गया है बे-चारा गधे इस देश के गधे को बाप भी अपना समय पर वो बताते हैं। गधे बन गये अरबी घोड़े गधे हो गये आज गन्दे हैं हम लोग गमों के बोझ का साया बहुत घनेरा है गया अँधेरा-हुआ सवेरा गया दिवाकर हार गया पुरातन भूल गयी चाँदनी रात गयी बुराई हार? गयी मनुजता हार गये आचरण भूल गरम-गरम ही चाय गरमी का अब मौसम आया गरमी में घनश्याम गरमी में जीना हुआ मुहाल गरमी में ठण्डक पहुँचाता मौसम नैनीताल का गरमी में तरबूज सुहाना गरिमा जीवन सार गरिमा दीपक पन्त गर्मी गर्मी आई खाओ बेल गर्मी के फल गर्मी को अब दूर भगाओ गर्मी में खीरा वरदान गर्मी में स्वेदकण गर्मी से तन-मन अकुलाता गली-गली में बिकते बेर गले न मिलना ईद गले पड़े हैं लोग गा रही दीपावली गाँधी का निर्वाण गांधी जी कहते हे राम! गाँधी जी का चित्र गांधी जी का जन्म दिवस गांधी हम शरमिन्दा हैं गांधीजयन्ती गाँव याद बहुत आते हैं गाँवों का निश्छल जीवन गाओ फिर से नया तराना गाता है ऋतुराज तराने गाना तो मजबूरी है गान्धी-लालबहुदुर जयन्ती गाय गाय-भैंस को पालना गायब अब हल-बैल गिजाई गिनते नहीं हो खामियाँ अपने कसूर पे गिरवीं बुद्धि-विवेक गिरवीं रखा जमाल गिरी जनक पर गाज गिलहरी गीत गीत "गाओ फिर से नया तराना" गीत और प्रीत का राग है ज़िन्द़गी गीत का व्याकरण गीत की परिभाषा के साथ मेरा एक गीत गीत को भी जानिए गीत गाना जानता है गीत गाने का ज़माना आ गया है गीत ढोंग-आडम्बर गीत न जबरन गाऊँगा गीत बन जाऊँगा गीत मेरा गीत सुनाती माटी गीत सुनाती माटी अपने गीत सुर में गुनगुनाओ तो सही गीत-ग़ज़लों का तराना गीत-छन्द लिखने का फैशन हुआ पुराना गीत? गीत. नाविक फँसा समन्दर में गीत. पुनः हरा नही हो सकता गीत. मतवाला गिरगिट रूप बदलता जाता है गीत. मेरे तीन पुराने गीत गीत. वीरों के बलिदान से गीतकार नीरज तुम्हें गीतिका गीतिका छन्द गीतिका. आजादी की वर्षगाँठ गीदड़ और विडाल गुझिया-बरफी गुटबन्दी के मन्त्र गुनगुनाओ तो सही गुब्बारे गुरु नानक का जन्मदिन गुरु नानक जयन्ती गुरु पूर्णिमा गुरु वन्दना गुरुओं का ज्ञान गुरुओं का दिन गुरुकुल में हम साथ पढ़े गुरुदेव का वन्दन गुरुवर का सम्मान गुरू ज्योति का पुंज गुरू पूर्णिमा गुरू पूर्णिमा-गंगा स्नान गुरू वन्दना गुरू सहाय भटनागर गुरू सहाय भटनागर नहीं रहे गुरू-शिष्य गुरूकुल गुरूदक्षिणा गुरूदेव का ध्यान गुरूद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब गुरूनानक का दरबार गुरूपूर्णिमा गुरूवन्दना गुरूसहाय भटनागर बदनाम गुरूसहाय भटनागार गुर्गे देते बाँग गुलमोहर गुलमोहर का रूप गुलमोहर का रूप सबको भा रहा गुलमोहर खिलने लगा गुलमोहर लुभाता है गुलशन बदल रहा है गुलाब दिवस गुलामी बेहतर थी गुलाल-अबीर गूँगी गुड़िया आज गूँगे और बहरे हैं गूँज रहा उद्घोष गूँज रहे सन्देश गूगल-फेसबुक गेहूँ गेहूँ करते नृत्य गैस सिलेण्डर गैस सिलेण्डर है वरदान गोबर की ही खाद गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे गोमुख से सागर तक जाती गोरा-चिट्टा कितना अच्छा गोरी का शृंगार गोल-गोल है दुनिया सारी गोवर्धन गोवर्धन पूजा गोवर्धन पूजा करो गोवर्धनपूजा और भइयादूज की शुभकामना गोवर्धनपूजा और भइयादूज की शुभकामनाएँ गोविन्दसिंह कुंजवाल गौमाता भूखी मरे गौमाता से प्रीत गौरय्या गौरय्या का गाँव गौरय्या का नीड़ चील-कौओं ने हथियाया है गौरय्या के गाँव में गौरव और गुमान की गौरव का आभास गौरी और गणेश गौरैया का गाँव में पड़ने लगा अकाल गौरैया ने घर बनाया ग्यारह दोहे ग्राम्यजीवन ग्रीष्म ग्वाले हैं भयभीत घटते जंगल-खेत घटते वन-बढ़ता प्रदूषण घनाक्षरी घनाक्षरी गीत घर की रौनक घर भर का अभिमान बेटियाँ घर में कभी न लायें हम घर में पढ़ो नमाज घर में पानी घर में बहुत अभाव घर सब बनाना जानते हैं घातक मलय समीर घास घिर-घिर बादल आये घिर-घिर बादल आये रे घुटता गला सुवास का घूम रहा है चक्र घोंसला हुआ सुनसान आज तो घोटालों पर घोटाले घोड़ों से भी कीमती घोर संक्रमित काल में मुँह पर ढको नकाब चंचल “रूप” सँवारा चंचल चितवन नैन चंचल सुमन चकरपुर चक्र है आवागमन का चक्र है आवागमन का। चढ़ा केजरी रंग चढ़ा हुआ बुखार है चतुर्दशी का पर्व चदरिया अब तो पुरानी हो गयी चना-परमल चन्दा कितना चमक रहा है चन्दा देता है विश्राम चन्दा मामा-सबका मामा चन्दा से मुझको मोह नहीं चन्दा-सूरज चन्द्र मिशन चन्द्रमा सा रूप मेरा चमकती न बिजली न बरसात होती चमकेगा फिर से गगन-भाल चमचों की महिमा चमत्कार चमन का सिंगार करना चाहिए चमन की तलाश में चमन हुआ गुलजार चम्पावत जिले की सुरम्य वादियाँ चम्पू काव्य चरित्र चरित्र पर बाइस दोहे चरैवेति का मन्त्र चरैवेति की सीख चरैवेति-मेरा एक गीत चलके आती नही चलता खूब प्रपञ्च चलता जाता चक्र निरन्तर चलते बने फकीर चलना कछुआ चाल चलना कभी न वक्र चलना सीधी चाल। चलने से कम दूरी होगी चला दिया है तीर चला है दौर ये कैसा चली झूठ की नाव चली बजट की नाव चले आये भँवरे चले थामने लहरों को चलो दीपक जलाएँ हम चलो भीगें फुहारों में चलो होली खेलेंगे चवन्नी चहक रहे घर द्वार चहक रहे हैं उपवन में चहक रहे हैं रंग चहक रहे हैं वन-उपवन में चहकता-महकता चमन चहका है मधुमास चहके गंगा-घाट चहके प्यारी सोन चिरैया चाँद बने बैठे चेले हैं चाँद-तारों की बात करते हैं चाँद-सूरज चाँदनी का हमें “रूप” छलता रहा चाँदनी रात चाँदनी रात बहुत दूर गई चाँदी की संगत चाचा नेहरू को शत्-शत् नमन चाचा नेहरू तुम्हें नमन चाटुकार सरदार हो गये चापलूस बैंगन चाय चाय हमारे मन को भाई चार कुण्डलियाँ चार चरण-दो पंक्तियाँ चार दोहे चार फुटकर छन्द चारों ओर बसन्त हुआ चारों ओर भरा है पानी चालबाजी चाहत कभी न पूरी होगी चिंकू तो है शाकाहारी चिंकू ने आनन्द मनाया चिट्टाकारी दिवस बनाम ब्लॉगिंग-डे चिट्ठी-पत्री का युग बीता चिड़िया चिड़ियारानी चिड़ियों की कारागार में पड़े हुए हैं बाज चित्रकारिता दिवस चित्रग़ज़ल चित्रपट चित्रावली चित्रोक्ति चिन्तन चिन्तन-मन्थन चीत्कार पसरा है सुर में चीनी लड़ियाँ-झालर अपने चुगलखोर चुनना नहीं आता चुनाव चुनाव लड़ना बस की बात नहीं चुनावी कानून में बदलाव की जरूरत चुम्बन का व्यापार चुम्बन दिवस चुम्बन दिवस की शुभकामनाएँ चुम्बनदिवस चुरा रहे जो भाव चूनरी तो तार-तार हो गई चूस मकरन्द भँवरे किनारे हुए चूहों की सरकार में बिल्ले चौकीदार चेतावनी चेहरा चमक उठा चेहल्लुम का जुलूस चैतन्य की हिन्दी की टेक्सटबुक (अंकुर हिन्दी पाठमाला) चॉकलेट देकर नहीं चॉकलेट देकर नहीं उगता दिल में प्यार चॉकलेट-डे चोदहदोहे चोर पुराण चोरों से कैसे करें अपना यहाँ बचाव चोरों से भरपूर है आभासी संसार चौकस चौकीदार चौदह जनवरी-चौदह दोहे चौदह दिन के ही लिए हिन्दी से है प्यार चौदह दोहे चौदह फरवरी चौदह सितम्बर को समर्पित चौदह दोहे चौदह सितम्बर-चौदह दोहे चौपाई चौपाई के बारे में भी जानिए चौपाई लिखना सीखिए चौपाई लिखिए चौमासा बारिश से होता चौमासे का रूप चौमासे ने अलख जगाई छँट गये बादल हुआ निर्मल गगन छंदहीनता छटा अनोखी अपने नैनीताल की छठ का है त्यौहार छठ पूजा छठ माँ का उद्घोष छठ माँ हरो विकार छठपूजा छठपूजा त्यौहार छन्द और मुक्तक छन्द क्या होता है? छन्द हो गये क्ल्ष्टि छन्दशास्त्र छन्दों का विज्ञान छन्दों के विषय में जानकारी छल-छल करती गंगा छल-छल करती धारा छल-फरेब के गीत छल-बल की पतवार छाई हुई उमंग छाई है बसन्त की लाली छाता छाते छाप रहे अखबार छाया का उपहार छाया चारों ओर उजाला छाया देने वाले छाते छाया बहुत अन्धेरा है छाया भारी शोक छाया है उल्लास छाये हुए हैं ख़यालात में छिन जाते हैं ताज छीनी है हिन्दी की बिन्दी छुक-छुक करती आती रेल छुट्टी दे दो अब श्रीमान छुहारे-किशमिश छूट गया है साथ छोटी-छोटी बात पर छोटे पुत्र विनीत का छोटे पुत्र विनीत का जन्मदिन छोटे पुत्र विनीत का जन्मदिवस छोटों को सम्बल दिया लिया बड़ों से ज्ञान छोड़ विदेशी ढंग छोड़ा पूजा-जाप छोड़ा मधुर तराना जंग ज़िन्दगी की जारी है जंगल का कानून जंगल की चूनर धानी है जंगल के शृंगाल सुनो जंगलों के जानवर जंगी यान रफेल जकड़ा हुआ है आदमी जग उसको पहचान न पाता जग का आचार्य बनाना है जग के झंझावातों में जग के नियम-विधान जग को लुभा गये हैं जग में अन्तरजाल जग में ऊँचा नाम जग में केवल योग जग में माँ का नाम जग में सबसे न्यारा मामा जग है एक मुसाफिरखाना जगत है जीवन-मरण का जगदम्बा माँ आपकी जगमग सजी दिवाली जगह-जगह मतदान जड़े न बदलें पेड़ जन-गण का विश्वास जन-गण का सन्देश जन-गण रहे पछाड़ जन-जागरण जन-जीवन बेहाल जन-मानस बदहाल जन.2017 में मेरा गीत जनता का जनतन्त्र जनता का तन्त्र कहाँ है जनता का धीरज डोल रहा जनता जपती मन्त्र जनता है कंगाल जनमानस के अन्तस में आशाएँ मुस्काती हैं जनमानस लाचार जनवरी-2017 जनसेवक खाते हैं काजू जनसेवक लाचार जनहित के कानून को जन्म दिन जन्म दिन मेरी श्रीमती जन्म दिवस जन्मदिन जन्मदिन की दे रहे हैं सब बधायी जन्मदिन पर रूप मुझको भा गया है जन्मदिन फिर आज आया जन्मदिन है आज मेरा जन्मदिवस जन्मदिवस की बेला पर जन्मदिवस चाचा नेहरू का जन्मदिवस चाचा नेहरू का भूल न जाना जन्मदिवस पर विशेष जन्मदिवस विशेष जन्मदिवस विशेष) जन्मदिवस है आज जन्मभूमि में राम जन्माष्टमी जन्मे थे धनवन्तरी जब खारे आँसू आते हैं जब पहुँचे मझधार में टूट गयी पतवार जब मन में हो चाह जब-जब मक्कारी फलती है जमा न ज्यादा दाम करें जमाना बहुत बदल गया जय बोलो नन्दलाल की जय माता की कहने वालो जय विजय जय विजय 2019 में मेरी बालकविता जय विजय अगस्त-2019 जय विजय के फरवरी जय विजय जुलाई-2018 जय विजय जून जय विजय पत्रिका में मेरा गीत जय विजय पत्रिका में मेरी बालकविता जय विजय मई जय विजय मासिक पत्रिका के नवम्बर-2016 अंक में मेरी ग़ज़ल जय विजय में मेरी बाल कविता जय विजय-अप्रैलः2020 जय शिक्षा दाता जय सिंह आशावत जय हिन्दी-जय नागरी जय हो देव महेश जय हो देव सुरेश जय-जय गणपतिदेव जय-जय जगन्नाथ भगवान जय-जय जय वरदानी माता जय-जय-जय गणपति महाराजा जय-जवान और जय-किसान जय-विजय जय-विजय अगस्त जय-विजय पत्रिका जय-विजय पत्रिका में मेरा गीत जय-विजय पत्रिका अक्टूबर-2016 में मेरी ग़ज़ल प्रकाशित जयविजय जयविजय नवम्बर 2018 जयविजय मई-15 जयविजय में मेरी ग़ज़ल जयविजय-जून जरी-सूत या जूट के धागे हैं अनमोल जरूरी है जल का स्रोत अपार कहाँ है जल जीवन की आस जल दिवस जल बिना बदरंग कितने जल बिना बेरंग कितने जल रहा च़िराग है जलद जल धाम ले आये जलधारा जलमग्न खटीमा जहरीला पेड़:A Poison Tree जाँच-परख कर मीत जागरण जागा दयानन्द का ज्ञान जागेगा इंसान जाति-धर्म के मन्त्र जातिवाद में बँट गये जादू-टोने जान बिस्मिल हुई जानिए मेरे खटीमा को भी जाने की तैयारी जाने वाला साल जाम जाम ढलने लगे ज़ारत जालजगत जालजगत की शाला है ज़ालिमों से पुकार मत करना जिजीविषा जितना चाहूँ भूलना उतनी आती याद जितने ज्यादा आघात मिले जिनके पास जमीर ज़िन्दगी ज़िन्दग़ी अब नरक बन गयी है ज़िन्दगी इक खूबसूरत ख़्वाब है जिन्दगी का सफर निराला है ज़िन्दग़ी का सहारा ज़िन्दग़ी की सलीबों पे चढ़ता रहा ज़िन्दग़ी के तीन मुक्तक ज़िन्दग़ी के लिए जिन्दगी जिन्दगी पे भारी है ज़िन्दग़ी भर उन्हें आज़माते रहे जिन्दगी भर सलामत रहो साजना ज़िन्दगी भर सलामत रहो साजना ज़िन्दग़ी में न ज़लज़ले होते जिन्दगी में प्यार-Life in a Love ज़िन्दग़ी सस्ती हुई जिन्दगी है बस अधूरी ज़िन्दग़ी जिन्दा उसूल हैं ज़िन्दादिली जिन्दादिली का प्रमाण दो जियो ज़िन्दगी को जिसमें पुत्रों के लिए होते हैं उपवास जी रहा अब भी हमारे गाँव में जीत का आचरण जीते-जी की माया जीना पड़ेगा कोरोना के साथ जीना-मरना सदा से जीने का अंदाज जीने का अन्दाज़ जीने का अन्दाज़ निराला जीने का आधार हो गया जीने का ढंग जीव सभी अल्पज्ञ जीवन जीवन आशातीत हो गया जीवन आसान बना देना जीवन का गीत जीवन का चक्र जीवन का ताना-बाना जीवन का भावार्थ जीवन का विज्ञान जीवन का संकट गहराया जीवन का है मर्म जीवन किताबी हो गया जीवन की अब शाम हो गई जीवन की आपाधापी में जीवन की ये नाव जीवन की है भोर तुम्हारे हाथों में जीवन के आधार जीवन के हैं खेल जीवन के हैं ढंग निराले जीवन को हँसी-खेल समझना न परिन्दों जीवन जटिल जलेबी जैसा जीवन जीना है दूभर जीवन तो बहुत जरा सा है जीवन दर्शन समझाया जीवन पतँग समान जीवन बगिया चहके-महके जीवन में अभिसार जीवन में सन्तुष्ट जीवन में है मित्रता जीवन ललित-ललाम जीवन श्रम के लिए बना है जीवन है बदहाल जीवन है बेहाल जीवनचक्र जीवनयात्रा जीवित देवी-देवता दुनिया में माँ-बाप जीवित रहती घास जीवित हुआ पराग जीवित हुआ बसन्त जुलाईः18 जुल्म के आगे न झुकेंगे जुल्म झोंपड़ी पर ढाया जूझ रहा है देश जूती-टोपी बनी सहेली जूतों की बौछार जून-2109 जेठ लग रहा है चौमासा जैविकपिता जैसे खर-पतवार जो नंगापन ढके बदन का हमको वो परिधान चाहिए जोकर जोकर खूब हँसाये जोकर-बौने ज्ञान का तुम ही भण्डार हो ज्ञान का प्रसाद लो ज्ञान की अमावस ज्ञान न कोई दान ज्ञान हुआ विकलांग ज्ञानी भी मूरख बनें ज्यादा दाद मिला करती है ज्यादा दोहाखोर ज्यादातर तो कट गयी ज्येष्ठ पुत्र का जन्मदिन ज्येष्ठ पुत्र नितिन का जन्मदिन ज्येष्ठ पूर्णिमा झंझावात बहुत गहरे हैं झंझावातों में झटका और हलाल झण्डे रहे सँभाल झनकइया मेला गंगास्नान झनकइया-खटीमा झरता हुआ प्रपात झरने करते शोर झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई की 160वीं पुण्यतिथि पर विशेष झाँसी की रानी झाड़ुएँ सवाँर लो झालर-बन्दनवार झुक गयी है कमर झुकेगी कमर धीरे-धीरे झूठ की तकरीर बच गयी झूठ जायेगा हार झूमर से लहराते हैं झूमर से सोने के गहने झूल रही हैं ममता-माया झूला झूले कैसे पड़ें बाग में? झेल रहा है देश झेलना जरूरी है टाबर टोली टिप्पणियाँ टिप्पणी और पसन्द टिप्पणी पोस्ट टुकड़ा-एमी लोवेल टूटा कुनबेवाद से टूटी-फूटी रोमन-हिन्दी टॉम-फिरंगी टॉम-फिरंगी प्यारे-प्यारे टोपी टोपी हिन्दुस्तान की टोपी है बलिदान की ठलवे-जलवे ठहर गया जन-जीवन ठिठुर रहा है गात ठिठुर रही है सबकी काया ठिठुरा बदन है ठिठुरा सकल समाज ठेंगा न सूरज को दिखाना चाहिए ठेले पर बिकते हैं बेर ठोकरें खाकर सँभलना सीखिए डमरू का अब नाद सुनाओ डरता हूँ डरा और धमका रहा कोतवाल को चोर डरा रहा देश को है करोना डूबे गोताखोर डॉ. गंगाधर राय डॉ. महेन्द्र प्रताप पाण्डेय 'नन्द' डॉ. राजविन्दर कौर डॉ. सारिका मुकेश डॉ. सुभाष वर्मा डॉ. हरि 'फैजाबादी' डॉ.धर्मवीर डॉ.राष्ट्रबन्धु डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ डॉक्टर गोपेश मोहन जैसवाल डोल रहा ईमान डोलियाँ सजने लगीं ढंग निराले होते जग में मिले जुले परिवार के ढंग हमारे बदल गये ढकी ढोल की पोल ढल गयी है उमर ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए ढाईआखर ढुल-मुल नहीं उसूल ढोंग और षड़यन्त्र ढोंग-आडम्बर ढोंगी और कुसन्त ढोंगी साधू ढोलकी का सुर नगाड़ा हो गया तंज करने से बिगड़ती बात हैं तजना नहीं उमंग तजो पश्चिमी रीत तन्त्र अब खटक रहा है तन्त्र ये खटक रहा है तपते रेगिस्तानों में तब मैने माँ तुम्हें पुकारा तब-तब मैं पागल होता हूँ तबाही के कुछ ताजा चित्र तमन्नाओं की लहरे हैं तम्बाकू दो त्याग तम्बाकू को त्याग दो तम्बाकू दो छोड़ तम्बाकू निषेध दिवस तम्बाकू निषेध दिवस पर सन्देश तरबूज तरस रहा माँ-बाप की तवर्ग ताजमहल का सच ताजमहल की हकीकत ताल-लय उदास हैं तालाबों की पंक तिगड़ी की खिचड़ी तिज़ारत तिज़ारत में सियासत है तिजारत ही तिजारत है तितली तितली आई! तितली आई!! तितली करती नृत्य तितली है फूलों से मिलती तिनका-तिनका दोहा संग्रह तिनके चुन-चुन लाती हैं तिरंगा बना देंगे हम चाँद-तारा तिलक दूज का कर रहीं तीज आ गई है हरियाली तीजो का आया त्यौहार चलो झूला झूलेंगे तीजो का त्यौहार तीन अध्याय तीन तलाक तीन दिनों से भार बारिश तीन मिसरी शायरी (तिरोहे) तीन मुक्तक तीन साल का लेखा जोखा तीन-लाइना तीस सितम्बर तुकबन्दी तुकबन्दी को ही अपनाओ तुकबन्दी मादक-उन्मादी तुकबन्दी से खिलता उपवन तुम पंखुरिया फैलाओ तो तुम साथ क्या निभाओगे? तुम हो दुर्गा रूप तुमने सबका काज सँवारा तुमसे ही मेरा घर-घर है तुमसे ही है दुनियादारी तुम्हारे चरण-रज का कण चाहता हूँ तुम्हारे हाथों में तुम्ही मेरी आराधना तुम्हीं ज्ञान का पुंज तुम्हीं साधना-तुम ही साधन तुलसी का पौधा गुणकारी तुलसी का बिरुआ गुणकारी तुलसीदास तुहिन-हिम नभ से अचानक धरा पर झड़ने लगा तू माँ का वरदान ना पाये तू से आप और सर तूफानों से लड़ने में तेजपाल का तेज तेरह दोहे तेरह सितम्बर तेल कान में डाला क्यों? तेल-लकड़ी तेवर नहीं अब वो रहे तो कोई बात बने तोंद झूठ की बढ़ी हुई है तोता तोल-तोलकर बोल त्योहारों की रीत त्यौहार त्यौहारों की गठरी त्यौहारों पर किसी का खाली रहे न हाथ थक जायेगी नयी रीत फिर थम जाये घुसपैंठ थमे हुए जल में सदा बन जाते शैवाल थर-थर काँपे देह थाली के बैंगन थीम चुराई मेरी थोड़ी है अवशेष थोड़े दिन का प्यार थोड़े दोहाकार है दंगों का है जोर दबा सुरीला कोकिल का सुर दबी हुई कस्तूरी होगी दम घुटता है आज चमन में दम घुटता है आज वतन में दमक उठा है रूप भी’ दया करो हे दुर्गा माता दयानन्द पाण्डेय दरबान बदलते देखे हैं दरवाजे की दस्तक दर्द का मरहम दर्द का सिलसिला दिया तुमने दर्द की छाँव में मुस्कराते रहे दर्द दिल में जगा दिया उसने दर्पण असली 'रूप' दिखाता दर्पण काला-काला क्यों दर्पण में तसबीर दलबदलू दशहरा दशहरा पर दस दोहे दस दोहे दहे दहेज दाढ़ी में है चोर दादी अम्मा दादी जी! प्रसाद दे दो ना दाम नहीं है पास दामिनी काण्ड की बरसी दामिनी को भावभीनी श्रद्धांजलि दिखने लगा उजाड़ दिखायी तो नहीं जाती दिखावा हटाओ दिन आ गये हैं प्यार के दिन में छाया अँधियारा दिन में सितारों को बुलाते हो दिन है कितना खास दिन है देवोत्थान का व्रत-पूजन का खास दिन हैं अब नजदीक दिनकर है भयभीत दिनांक 27-04-2016 दिया तिरंगा गाड़ दिल दिल की आग दिल की बात दिल की बेकरारी दिल की लगी क्या चीज़ है दिल के करीब और दिल से दूर दिल को बेईमान न कर दिल तो है मतवाला गिरगिट दिल में इक दीप जलाकर देखो दिल-ए-ज़ज़्बात दिलों में उल्फतें कम हैं दिल्लगी समझते हैं दिल्ली दिवस आज का खास दिवस बढ़े हैं शीत घटा है दिवस बहुत है खास दिवाली दिवाली को मनाएँ हम दिवाली मेला दिवाली मेला-नानकमत्ता साहिब दिव्य स्वरूप विराट दिशाहीन को दिशा दिखाते दिसम्बर दीन-ईमान के चोंचले मत करो दीन-ईमान पल-पल फिसलने लगे दीप अब कैसे जलेगा...? दीप खुशियों के जलाओ दीप खुशियों के जलें दीप जगमगाइए दीपक जलाएँ बार-बार दीपक-बाती दीपशिखा सी शान्त दीपावली दीपावली की शुभकामनाएँ दीपावली के दोहे दीपावली. अँधियारा हरते जाएँगे दीपों की दीपावली दीमक ने पाँव जमाया है दीमकों से चमन को कैसे बचायें? दीवाली पर देवता दुख-सन्ताप बहुत झेले हैं दुखद समाचार दुनिया का भूगोल दुनिया की नियति दुनिया की है रीत दुनिया को दें ज्ञान दुनिया भर में सबसे न्यारा दुनिया में इंसान दुनिया में नाचीज दुनिया वक्र है दुनिया से वह चला गया दुनियादारी दुनियादारी जाम हो गई दुर्गा जी की वन्दना दुर्गा जी के नवम् रूप हैं दुर्गा माता दुर्दशा दुल्हिन बिना सुहाग के लगा रही सिंदूर दुश्मन से लोहा लेना होगा दुष्ट हो रहे पुष्ट दूध-दही अपनाना है दूर करो अज्ञान दूर निकल जाते हैं बादल दूरी की मजबूरी दूषित हुआ वातावरण दूषित है परिवेश दे दो ज्ञान भवानी माता दे रहा मधुमास दस्तक देंगे नाम मिटाय देंगे बदल लकीर देंगे मिटा गुरूर देख तमाशा होली का देख बसन्ती रूप देखना इस अंजुमन को देखो कितना मुक्त है आभासी संसार देता है ऋतुराज निमन्त्रण देता है सन्देश देते हैं आनन्द देते हैं आनन्द अनोखा रिश्ते-नाते प्यार के देनी पड़ती घूस देव उत्थान देव दिवाली पर्व देव दीपावली देवउठनी देवदत्त 'प्रसून' देवदत्त 'प्रसून' जी हमारे बीच नहीं रहे। देवदत्त सा शंख देवपूजन के लिए सजने लगी हैं थालियाँ देवभूमि अपना भारत देवालय का सजग सन्तरी देवोत्थान देवोत्थान प्रबोधिनी एकादशी देश कहाये विश्वगुरू तब देश का दूषित हुआ वातावरण देश की अंजुमन बेच देंगे देश की कहानी देश की हालत देश को सुभाष चाहिए देश भक्ति गीत देश-प्रेम गीत देश-भक्ति गीत देश-समाज देशप्रेम का दीप जलेगा देशभक्त गुमनाम हो गये देशभक्ति देशभक्ति का जाप देशभक्ति गीत देशभक्तिगीत देशभक्तों का नमन होना चाहिए देहरा दून-सखनऊ के चित्र देहरादून यात्रा देहरादून यात्रा-दस दोहे दो अक्टूबर दो आँखें दो आँखों की रीत दो कुणडलियाँ दो कुण्डलियाँ दो गीत दो जून दो जून की रोटी दो जून रोटी दो पक्षों के बोल दो बच्चे होते हैं अच्छे दो मुक्तक दो शब्द दो हजार के नोट दो हाथों का घोड़ा दो-अक्टूबर दोनों पुस्तकों का विमोचन दोपहरी में शाम हो गई दोस्ती-दग़ाबाजी दोह दोहा दोहा ग़ज़ल दोहा गीत दोहा छन्द दोहा पच्चीसी दोहा बत्तीसी दोहा महिमा दोहा सप्तक दोहा-अष्टक दोहा-गीत दोहा-मुक्तक दोहाग़ज़ल दोहागीत दोहागीत. उपवन का परिवेश दोहागुणगान दोहाचित्र दोहाचोर दोहाछन्द दोहावली दोहाष्टक दोहासंग्रह दोहे दोहे "हनुमान जयन्ती" दोहे "राजनीति में हंस" दोहे और मुक्तक दोहे का विन्यास दोहे पर दोहे दोहे रखना सम अनुपात दोहे-जलता हुआ अलाव दोहे. उलटी गिनती पाक की दोहे. करवाचौथ सुहाग का दोहे. धीरज से लो काम दोहे. पर्व लोहिड़ी का हमें दोहे. पावस का आगाज दोहे. बहुत अनोखे ढंग दोहे. बापू जी के देश में बढ़ने लगे दलाल दोहे. भइयादूज दोहे. भारत देश महान दोहे. माता का अवतार दोहे. योगिराज का जन्मदिन दोहे" रचता जाय कुम्हार दोहेे दोहे् दोहों का मर्म दोहों पर दोहे दोहों में कुछ ज्ञान दोौहे धड़कन बिना शरीर धधक रही है आग धन का खुल्ला खेल धनतेरस धनतेरस त्यौहार धन्यवाद-ज्ञापन धन्वन्तरि जयन्ती धन्वन्तरि संसार को देते जीवनदान धन्वन्तरी जयन्ती धरती और पहाड़ पर है कुदरत की मार धरती का त्यौहार धरती का शृंगार धरती का सन्ताप धरती का सिंगार धरती का सौन्दर्य धरती गाती गान धरती ने पहना नया घाघरा धरती ने है प्यास बुझाई धरती पर नजारों को बुलाते हो धरती पर हरियाली छाई धरती है बदहाल धरा का प्रभावशाली चित्रण धरा के रंग धरा के रंग की भूमिका धरा दिवस धरा-दिवस धर्म रहा दम तोड़ धर्म हुआ मुहताज धर्मान्तरण के कारण धागे हैं अनमोल धान धान की बालियाँ धान खेतों में लरजकर पक गया है धान्य से भरपूर खेतों में झुकी हैं डालियाँ धारण त्रिशूल कर दुर्गा बन धारा यहाँ विधान की धावकमन बाजी जीत गया धीरज रखना आप धीरे-धीरे धीरे-धीरे घट रहा लोगों में अब प्यार धुँधली सी परछाई में धूप धूप अब खिलने लगी है धूप गुनगुनी पाने को धूप बहुत विकराल धूप में घर सब बनाना जानते हैं धूप यौवन की ढलती जाती है धूप हुई विकराल धूल चाटता रहा धो दिया कलंक ध्येय और संकल्प न कोई धर्म-न ईमान न जाने टूट जायें कब न फिर मात होती न शह कोई पड़ती नंगा आदमी भूखा विकास नंगेपन के ढ़ंग नई गंगा बहाना चाहता हूँ नखरे भी उठाये जाते हैं नगमगी 'रूप' ढल जायेगा नगमे सुखद बहार के नगर में नाग छलते हैं नज़र में कुछ और नजारा देख मौसम का नज़ारे बदल गये नदी का काम है बहना नदी के रेत पर नदी-नाले उफन आये नन्हे-मुन्ने नन्हें दीप जलायें हम नन्हेसुमन नफरतों का सिला दिया तुमने नभ पर घटा घिरी है काली नभ पर बादल छाये हैं नभ पर बादलों का है ठिकाना नभ में अब घनश्याम नभ में घना कुहासा छाया नभ में बदली काली लेकर आया है चौमास नभ में लाल-गुलाल उड़े हैं नमकीन पानी में बहुत से जीव ठहरे हैं नमन नमन आपको मात नमन तुम्हें शत् बार नमन शैतान करते हैं नमन हजारों बार नया आ गया साल नया गीत आया है नया जमाना आया है नया राष्ट्र निर्माण करेंगे नया साल नया साल 2017 नया साल आया है नया साल-2021 नया सृजन होता है नयागाँव-सितारगंज नयागीत नयासाल नयी रीत फिर नयी-कविता नये वर्ष का अभिनन्दन नये वर्ष का अभिनन्दन! नये वर्ष में आप हर्षित रहें नये साल का अभिनन्दन नये साल का सूरज नये साल की दस्तक नये साल के कदम पड़ने वाले हैं नये साल के साथ में सुधरेंगे हालात नर का निर्बल पक्ष नरक चतुर्दशी नरकचतुर्दशी नरेन्द्र मोदी नर्क चतुर्दशी नव वर्ष चलकर आ रहा नव सम्वतसर नव सम्वत्सर आया है नव-गीत नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे नव-वर्ष मनायें अब कैसे नवअंकुर उपजाओगे कब नवगीत नवगीत मचल जाते हैं नवजात नवदुर्गा नवदुर्गा के नवम् रूप हैं नवदुर्गा जी की आरती नवपल्लव परिधान नवरात्र नववर्ष नववर्ष से आशाएँ नववर्ष-2012 नवसम्वत से चमन का नवसम्वतसर नवसम्वतसर 2077 नवसम्वतसर मन में चाह जगाता है नवसम्वत्सर नवसम्वत्सर आ गया नवोदित नही ज़लज़लों से डरता है नहीं आता नहीं कभी मन को भटकाया नहीं किसी का जोर नहीं घटे क्यों दाम? नहीं चलेगा वंश नहीं जाती नहीं जेब में दाम नहीं पहचान पाये रूप नहीं रहा लालित्य नहीं राम का राज नहीं समय अनुकूल नहीं सरल है काम नहीं सुहाता ठण्डा पानी नहीं हमें अनुदान चाहिए नहीं हमें मंजूर नागपंचमी नागपंचमी-तीज नागपञ्चमी नागपञ्चमी आज भी श्रद्धा का आधार नागपञ्चमी श्रद्धा का आधार नागपञ्चमी-हरेला रक्षाबन्धन-तीज नागफनी का रूप नागफनी के फूल नागों के नेवलों से सम्बन्ध हो गये हैं नाज़ुक कलाई मोड़ ना नानकमत्ता साहिब का दिवाली मेला नानकमत्तासाहिब नानी का घर नानी का घर सुख का धाम नाम के इंसान हैं नाम गिलहरी नाम बड़े हैं दर्शन थोड़े नाम है आचमन जाम ढलने लगे नारायणदत्त तिवारी नारि नारि न हुआ नारिशक्ति नारी नारी का सम्मान करो नारी की आवाज नारी की कथा-व्यथा नारी की महिमा नारी की व्यथा... नारी दिवस नारी दुर्गा रूप नारी रूप अगर देते निखरा हुआ चन्द्रमा निखरा-निखरा गात निखरा-निखरा है नील गगन निज पुरुखों को याद निठल्ला-चिन्तन नित नया पर्व नितिन नितिन का जन्मदिन नितिन शास्त्री नित्य-नियम से योग निन्दा प्रस्ताव निमन्त्रण निम्बौरी अब आयीं है नीम पर निम्बौरी आयीं है अब नीम पर नियति नियम और कानून नियमन में है खोट नियमों को अपनाओगे कब निर्झर निर्झर हमें सिखाते हैं निर्मल गंगा धार कहाँ है निर्मल हुए पहाड़ निर्मल हो परिवेश निर्वाचन निर्वाचनी बयार निर्वेद निश्छल पावन प्यार निष्ठा का त्यौहार निष्ठुर उपवन देखे हैं निष्पक्ष चुनाव के लिए नींद टूट जाया करती है... नीड़ को नव-ज्योतियों से जगमगायें नीति के दोहे नीति-रीति के पथ को गुरु ही बतलाता नीतिदशक नीम नीम की छाँव नीम की छाँव नहीं रही नीर पावन बनाओ करो आचमन नीरज जी से अन्तिम भेंट नीले-नीले अम्बर में नूतन का करता अभिनन्दन नूतन वर्ष का अभिनन्दन नूतन वर्षःअच्छे दिन? नूतन वर्षाभिनन्दन नूतन सम्वत्सर आया है नूतनवर्ष नूतनसम्वत्सर आया है नून नेक-नीयत हमेशा सलामत रहे नेट के सम्बन्ध नेता नेता आया बिनबुलाया है नेता का श्रृंगार नेता के पास जवाब नही नेता बाद में नेता महान नेता महान हैं नेताओं की तफरी नेताजी नेत्र शिव का खुल गया नेशनल दुनिया में मेरी बाल कविता नेह नेह का बिरुआ यहाँ कैसे पलेगा नेह के दीपक नैनीताल यात्रा नैसर्गिक शृंगार नैसर्गिक स्वाद मिठास का नोक लेखनी की भाला बन जाया करती है नोट पाँच सौ के हुए सभी पुराने बन्द नौ दिन तक उपवास नौकरशाही भ्रष्ट नौका में है छेद कहीं नौका लहरों में फँसी बेबस खेवनहार नौशेरी ग़ज़ल पं. गोविन्द बल्लभ पन्त पं. नाराचण दत्त तिवारी पं. लाल बहादुर शास्त्री पं.नारायणदत्त तिवारी पंक में खिला कमल पंक से मैला हुआ है आवरण पंखुड़ियों के रंग पंच तत्व की देह पंच पर्व नजदीक पंछी पंजी-दस्सी-चवन्नी पकवानों का थाल लिए होली आई है पक्के आम पचास साल पहले इसे लिखा था पच्चीस दोहे पछुआ पश्चिम से है आई पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी है पड़ने लगा अकाल पड़ने वाले नये साल के हैं कदम पड़ी कूप में भाँग पढ़ गीता के श्लोक पढ़ लेते हैं सारी भाषा पढ़ना बहुत जरूरी है पढ़ना-लिखना पढ़ना-लिखना मजबूरी है पढ़ने में भी ध्यान लगाओ पढ़े-लिखे मुहताज़ पण्डित टीकाराम पतंग पत्थर पत्थर दिल कब पिघलेंगे पत्थरों को तोड़ ना पत्थरों में से धारे निकल आयेंगे पत्रकारिता दिवस पत्रिका एवं पुस्तकों का विमोचन पथ उनको क्या भटकायेगा पथ का निर्माता हूँ पथ नहीं सरल यहाँ पथ नापते हैं चरण पथ पर जाना भूल गया पथरीला पथ अपनाया है पनप रहा व्यभिचार पनप रहा है भोग पन्थ अनोखा बतलाया पन्द्रह दोहे पन्नियाँ बीन रहा है बचपन परदेशियों ने डेरा डाला हुआ चमन में परदेशी परमपिता का दूत परवाना फड़कता है पराक्रम जीवन में अपनाओ परिणय को अपने हुए परिभाषा परिभाषाएँ परिवर्तन परिवेश परिवेश में गजल परिश्रमी धुनता काया परीक्षा परेशान हैं आम पर्यावरण पर्यावरण का नियन्ता पर्यावरण दिवस पर्यावरण बचाइए पर्यावरण बचाइए धरती कहे पुकार पर्व अहोई पर्व अहोई खास पर्व अहोई-अष्टमी पर्व नया-नित आता है पर्व लोहड़ी में करो पर्व हरेला आज पर्वत पर चढ़ना होता आसान नहीं पर्वत बन कर डटे रहेंगे पर्वत सभी को भा रहे हैं पर्वत से बह निकले धारे पर्वतीयमहिला पर्वों का परिवेश पर्वों का विन्यास पल में तोला पल में माशा पल रहीं कैदियों की तरह पलाश के फूल पवन बसन्ती चलकर वन में आया पवनपुत्र हनुमान पश्चिम अनुकरण का अब तो कर दो त्याग पश्चिम का प्रणय सप्ताह पश्चिम की है सभ्यता पश्चिम के दिन-वार पहनावा बदला पहरे पहली बारिश पहली बारिश का आना पहली बारिश जून की पहली बारिश मानसून की पहले छाया बौर निम्बौरी अब आयीं है पहाड़ पहाड़ी की यही असली कहानी है पहाड़ी मनीहार पहाड़ी रूप पहाड़ों की सतह में पहाड़ों के ढलानों पर पहाड़ों में मचलता है पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा पाँच दिसम्बर पाँच मार्च पाँच मुक्तक पाँच शब्द चित्र पाँच शब्दचित्र पाँचमुक्तक पाक आज कुख्यात पाक की...नीयत है नापाक पाक से करना युद्ध जरूरी है पाकर शुभसन्देश पागल की पहचान पागल बनते लोग पागल मधुकर घूम रहे आवारा हैं पात झर गये मस्त पवन में पात्र बना परिहास का पानी पानी का भण्डार पानी की चाहत पानी को लाचार पाप गंगा में बहाने चल दिये पापी राम-रहीम पार्थना पालतू जानवर सिर्फ पालतू ही नहीं होता पालते हैं हम सुमन को पावन और पवित्र पावन करवाचौथ पावन है त्यौहार पावन हो परिवेश पावस का त्यौहार पाषाणों को गढ़ने में पाषाणों से प्यार हो गया पिकनिक पिघलते रहेंगे चेहरे पिचकारी पिछड़ा हुआ है आदमी पिता जी पिता जी और मैं पिता जी और मैं-भाग एक पिता विधातारूप पिता सबल आधार पितादिवस पर विशेष पितृ दिवस पितृ-दिवस पितृदिवस पितृदिवस पर विशेष पितृपक्ष में कीजिए पियो घोटकर नीम पीड़ा के पाँच दोहे पीपल पीपल राजा देवों से बतियाता है पीपल ही उद्गाता है पीला पत्ता पीले गजरे झूमर से लहराते हैं पीले झूमर पीले फूलों के गजरे पुकार पुच्छल दोहे पुतला पुत्र-पुत्री पुनः नया अध्याय पुनर्जन्म की प्रक्रिया पुरखों की जागीर पुराना गाँव पुराना पेड़ पुराना लगता है पुरानी कविता पुरानी डायरी से पुरानी रचना पुरानी सीपिकाएँ पुष्प पुस्तक दिन पुस्तक दिवस पुस्तक समीक्षा पुस्तक से सम्वाद पुस्तक-दिन पुस्तक-दिन हो सार्थक पूज्य पिता जी आपका पूज्य पिता जी आपको शत्-शत् नमन... पूज्य पिता जी आपको श्रद्धापूर्वक नमन पूज्य पिता जी को श्रद्धञ्जलि दिनाक 01-08-2014 को पूज्य पिताश्री को नमन पूज्य पिताश्री! आपके बिना बहुत अधूरा हूँ मैं। पूज्या माता जी आपको शत्-शत् नमन पूरा विवरण पूरी दुनिया में कोरोना पूर्ण करेंगी आस पूर्ण छियालिस वर्ष पूर्णिमा वर्मन पृथ्वी दिवस पृथ्वीदिवस पेड़ को देते चुनौती आजकल बौने शज़र पेड़ जंगल के सयाने हो गये हैं पेड़ लगाओ-धरा बचाओ पेड़-पौधे पेड़ों पर पकती हैं बेल पेपरवेट पैदा हुआ नरेन्द्र. मोदी का जन्मदिन पैराडाइज पत्रिका में मेरे दोहे पॉडकाट पॉडकास्ट प़ॉडकास्ट पोस्ट को लगाने के बारे में उपयोगी सुझाव पौत्र का जन्मदिन पौत्र प्राँजल का 20वाँ जन्मदिन पौत्र प्राँजल का 22वाँ जन्मदिन पौत्र रत्न के रूप में पौध लगाओ पौधे नये लगाऊँगा पौधे मुरझाये गुलशन में पौधों पर छाया है यौवन प्यार प्यार आज़मायेंगे प्यार और अनुराग प्यार करता है संसार सारा प्यार कहाँ से लाऊँ? प्यार का अन्दाज़ कहना चाहते हैं प्यार का ज़ज़्बा प्यार का झरना प्यार का पाठ पढ़ाता क्यों है प्यार का मरहला नहीं होता प्यार का मौसम आया प्यार की गंगा बहाना सीखिए प्यार की जड़ तलाश करते हो प्यार की बातें प्यार के चार पल प्यार के दस दोहे प्यार के बिन अधूरे प्रणयगीत हैं प्यार के सिलसिले नहीं होते प्यार को बदनाम करने को चले हैं प्यार नहीं व्यापार प्यार भरे अशआर प्यार से झेलना वक्त की मार को प्यार से पुकार लो प्यार-प्रीत की राह प्यार-मुहब्बत प्यार-मौहब्बत प्यार-वफा प्यारा नैनीताल प्यारी गौरय्या" प्यारी प्राची प्यारे गौतम बुद्ध प्रकाशन प्रकाशित ग़ज़ल प्रकृतिचित्रण प्रजातन्त्र की बेल प्रजातन्त्र हुआ बदनाम प्रज्ञा जहाँ है प्रतिज्ञा वहाँ है प्रणय दिवस के 14 दोहे प्रणय सप्ताह प्रणय सप्ताह का दूसरा दिवस प्रणय-गीत प्रणय-प्रीत सप्ताह प्रतिज्ञा दिवस प्रतिज्ञादिवस प्रतिज्ञादिवस में प्रतिज्ञा कहाँ है प्रभा के साथ तम क्यों है प्रभू पंख दे देना सुन्दर प्रलय हुई केदारनाथ में प्रवास-यात्रा प्रश्न जाल प्रश्नजाल प्रस्ताव दिवस प्रांजल प्रांजल की 17वीं वर्षगाँठ प्राची प्राची का जन्मदिन प्राणों से प्यारा है अपना वतन प्रातराश प्रारब्ध है सोया हुआ प्रार्थना प्रीत का व्याकरण प्रीत की सौगात लेकर प्रीत के विमान पर सम्पदा सवार है प्रीत पोशाक नयी लायी है प्रेम का सचमुच हुआ अभाव प्रेम गीत को विदाई प्रेम दिवस का रंग प्रेम-प्रीत का ढंग. वैलेंटाइन प्रेम-प्रीत का हो संसार प्रेमंदिवस प्रेमचन्द जयन्ती प्रेमदिवस प्रेमदिवस का खेल प्रेमदिवस का रंग प्रेमदिवस नजदीक प्रेमदिवस नज़दीक प्रेमदिवस पर प्रीत प्रेरक नाम कलाम प्रेरक प्रसंग प्रेरक-प्रसंग प्लम फकीर फटी घाघरा-चोली फतह मिलती सिकन्दर को फरमाइश पर नहीं लिखूँगा फल फल वाले बिरुए उपजाओ फलवाले पेड़ लगाना है फलसफा फसल उगी कमजोर फसल करो तैयार फसलें हैं तैयार फस्ट अप्रैल फागुन की फागुनिया फागुन की फागुनिया लेकर आया मधुमास फागुन की रंगोली फागुन की रंगोली का फागुन में ओले-पानी फागों और फुहारों की फासले इतने तो मत पैदा करो फासले इतने न अब पैदा करो फिर कनेर मुस्काया है फिर गहराये काले बादल फिर भी हँसते जाते हो फिर से अपने खेत में फिर से आई होली फिर से नूतन हर्ष फिर से बगिया है बौराई फिर से बालक मुझे बना दो फिर से लो अवतार फिर से वन्देमातरम नक्शे में हो जाय फिर से वीणा झंकार करो फिर से हरा-भरा हुआ उजड़ा हुआ दयार फिरंगी कुत्ता फिरकापरस्ती फिसल जाते तो अच्छा था फीका पड़ा बसन्त फीका रंग-गुलाल फीके सब त्यौहार फीके हैं त्यौहार फुटकर दोहे फुरसत नहीं मिलती फुर्सत नहीं मिलती फूटनीति का रंग फूल फूल और काँटे फूल कातिल हुए फूल क़ातिल हुए फूल खिलते हैं चमन में फूल खिले हैं पलाश में फूल फिर से बगीचे में खिल जायेंगे फूल बनकर सदा खिलखिलाते रहे फूल बने उपहार फूल बसन्ती आने वाले फूल हैं पलाश में फूल हो गये अंगारों से फूल-शूल फूली-फूली रोटियाँ फूले नहीं समाते हैं फूलों की बरसात फेसबक और ब्लॉगिं फैला भ्रष्टाचार फैली खर-पतवार फैले जिनके हाथ फैले धवल उजास फैशन फोटो फीचर फोटोफीचर बंजर हुई जमीन बंजर होते खेत बँटवारा बकरीद बकरे-बकरी बकरों का बलिदान चढ़ाकर बगावत भी करे कैसे बगिया में नवल निखार भरो बगीचे में ग़ुलों पर आब है बचपन बचपन के दिन बचपन को लौटा दो बचपन मेरा खो गया बचा लो पर्यावरण बच्चे बचपन याद दिलाते बच्चे होते स्वयं खिलौने बच्चों अब मत समय गँवाओ बच्चों का मन होता सच्चा बच्चों का संसार निराला बच्चों की महिमा है न्यारी बच्चों के प्यारे चाचा नेहरू को शत्-शत् नमन! बच्चों के मन को भाती हो बछड़े की पुकार बज उठी वीणा मधुर बजट बजट करो स्वीकार बजने लगीं हैं तालियाँ बड़ा घिनौना काम बड़ा वतन होता है बड़ा होने से डरता हूँ बढ़ रही है महँगाई बढ़ता जाता लोभ बढ़ा जगत में ताप बढ़ा धरा का ताप बढ़ी फिर से मँहगाई बढ़े हुए हैं भाव बतलाओ तो जीवन क्या है बताओ कैसे उतरें पार? बताता जमा-खर्च बत्ती नीली-लाल बदन काँपता थर-थर-थर बदन जलाता घाम बदनाम बदनाम करने को चले हैं बदल गये बदल गये सब चाल-चलन बदल गये हैं अर्थ बदल गये हैं चित्र बदल गये हैं ढंग बदल जाते तो अच्छा था