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सोमवार, 6 अप्रैल 2009

"मरुथल में भी अनायास, कलियाँ खिल जाती हैं।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


जीवन के हर चौराहे पर, गलियाँ मिल जाती हैं।


मरुथल में भी अनायास, कलियाँ खिल जाती हैं।।




बेहोशी में पड़े रहे तो, प्राण निकल जायेंगे,


पाकर पवन झकोरें, सोये गुल खिल जायेंगे,


सरिता की धाराएँ, खारे जल में घुल जाती हैं।


मरुथल में भी अनायास, कलियाँ खिल जाती हैं।।




सफर, सफर है, इसमें यादें आती जाती है,


रिश्तों की बुनियाद, सफर में बनती जाती है,


भूली-बिसरी बात, कहानी में ढल जाती हैं।


मरुथल में भी अनायास, कलियाँ खिल जाती हैं।।




मेंहदी तो सजनी-साजन के, हाथों में रचती है,


उसकी महक हृदय के, कोने-कोने में बसती है,


भँवरे को फिर से, उसकी गुंजन मिल जाती हैं।


मरुथल में भी अनायास, कलियाँ खिल जाती हैं।।




प्रेम अमर है, प्रेम अजर है, उसकी अपनी है भाषा,


ढाई आखर में ही जग की, रची-बसी है जिज्ञासा,


मिलन-यामिनी में, उलझी लड़ियाँ खुल जाती हैं।


मरुथल में भी अनायास, कलियाँ खिल जाती हैं।।




13 टिप्‍पणियां:

  1. सबके जीवन में एक सी बातें सबके अपने अपने ख्याल, आपकी इस गीत नुमा कविता का अलग अंदाज़

    उत्तर देंहटाएं
  2. behad khubsurat geet,marusthal mein kaliyon ka khilna,sunder

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर गीत और लाजवाब कल्पना. शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  4. त बहुत सुन्दर रचना है बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह.....वाह.....।
    गीत मन को भा गया।
    ब्लाग पर छा गया।
    बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  6. शास्त्री जी!
    आपने बेहतरीन गीत लिखा है।
    मुबारकवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  7. मयंक जी!
    आपने सुन्दर गीत लिखा है।
    अपना गीत प्रकाशित कर
    पढ़वाने के लिए
    मेरी बधाई स्वीकार करें।

    उत्तर देंहटाएं
  8. अच्छे प्रतीकों के माध्यम से गीत में सरल भाषा में सीधी-साधी बात कही है।
    बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत बढिया लिखा है आपने ... बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  10. मिलन-यामिनी में, उलझी लड़ियाँ खुल जाती हैं।
    मरुथल में भी अनायास, कलियाँ खिल जाती हैं।।
    बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं

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