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मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

"मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




गीत पुराने, नये तराने अच्छे लगते हैं।

मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।


जब भी मन ने आँखे खोली, उनका दर्शन पाया,

देखी जब-जब सूरत भोली, तब-तब मन हर्षाया,

स्वप्न सुहाने, सुर पहचाने अच्छे लगते हैं,

मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।


रात-चाँदनी, हँसता-चन्दा, तारे बहुत रुलाते,

किसी पुराने साथी की वो, बरबस याद दिलाते,

गम के गाने, नये ठिकाने अच्छे लगते हैं।

मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।।


घाटी-पर्वत, झरने झर-झर, अभिनव राग सुनाते,

पवन-बसन्ती, रिम-झिम बून्दें, मन में आग लगाते,

देश अजाने, लोग बिराने अच्छे लगते हैं।

मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।।


6 टिप्‍पणियां:

  1. देश अजाने, लोग बिराने अच्छे लगते हैं।

    मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।।

    वाह वाह...मजा़ आ गया डाक्टसाब गीत पढ़कर।
    यह तो रागियों का भी है और बैरागियों का भी...
    शुक्रिया....

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर गीत. आनन्द आया शाश्त्री जी.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  3. शब्दों को बहुत सुंदर तरीके से पिरोया आपने.. आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. khwab suhane achche lagte hain
    tere tarane achche lagte hain


    bahut badhiya geet........dil se likha gaya.

    उत्तर देंहटाएं
  5. अच्छा लगा यह गीत ..लयबद्ध है .शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  6. गीत के बोल बहुत मधुर है और गेयता भी है.

    उत्तर देंहटाएं

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