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रविवार, 26 अप्रैल 2009

‘‘निश्छल सच्चा प्यार, बहुत अच्छा लगता है।’’ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’


शिष्ट मधुर
व्यवहार, बहुत अच्छा लगता है।

सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।



फूहड़पन के वस्त्र, बुरे सबको लगते हैं,

जंग लगे से शस्त्र, बुरे सबको लगते हैं,

स्वाभाविक श्रंगार, बहुत अच्छा लगता है।

सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।



वचनों से कंगाल, बुरे सबको लगते हैं,

जीवन के जंजाल, बुरे सबको लगते हैं,

सजा हुआ घर-बार, बहुत अच्छा लगता है।

सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।



चुगलखोर इन्सान, बुरे सबको लगते हैं,

सूदखोर शैतान, बुरे सबको लगते हैं,

सज्जन का सत्कार, बहुत अच्छा लगता है।

सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।



लुटे-पिटे दरबार, बुरे सबको लगते हैं,

दुःखों के अम्बार, बुरे सबको लगते हैं,

हरा-भरा परिवार, बहुत अच्छा लगता है।

सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।



मतलब वाले यार, बुरे सबको लगते हैं,

चुभने वाले खार, बुरे सबको लगते हैं,

निश्छल सच्चा प्यार, बहुत अच्छा लगता है।

सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

6 टिप्‍पणियां:

  1. शिष्ट मधुर व्यवहार, बहुत अच्छा लगता है।
    बहुत ही काव्यात्मक रूप में सुन्दर बात.............एक से बढ़ कर एक सुन्दर छंद...........गीत की तरह गाये जाने वाली पंक्तियाँ ........लाजवाब

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर सीख काव्यात्मक ढंग से दी आपने.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  3. zindagi ki gahri baton ko kavya mein bahut hi sundar dhang se vyakt kiya hai.

    उत्तर देंहटाएं
  4. apke shabdon ka sansaar achha lagta hai bahut sunder bhavaviyakti hai

    उत्तर देंहटाएं
  5. सपनों का संसार
    तभी अच्छा लगता है,
    जब तुम हो मेरे साथ,
    हृदय में लेकर मेरा प्यार!

    उत्तर देंहटाएं

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