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बुधवार, 15 अप्रैल 2009

"तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


झूठे-वादे, कोरे-नारे, झूठा सब अपना-पन है।


तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।



रंग-बिरंगे झण्डे फहराने की, सब में होड़ लगी है,


खुजली वाले नेताओं के, मन में कोढ़ लगी है,


रूखा-सूखा मत का भूखा, बिन पानी का ये घन है।


तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।।



पाँच साल जम कर लूटा, अब लुट जाने के दिन हैं,


वोट बैंक की खातिर, जूतों से पिट जाने के दिन हैं,


कुर्सी की खातिर ये करता, पूजा, हवन, भजन है।


तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।

10 टिप्‍पणियां:

  1. पाँच साल जम कर लूटा, अब लुट जाने के दिन हैं,
    वोट बैंक की खातिर, जूतों से पिट जाने के दिन हैं,
    कुर्सी की खातिर ये करता, पूजा, हवन, भजन है।
    तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।

    बहुत सटीक लिखा.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  2. वोट बैंक की खातिर, जूतों से पिट जाने के दिन हैं,
    कुर्सी की खातिर ये करता, पूजा, हवन, भजन है।
    तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।


    तीख सत्य है...........स्पष्ट और यथार्थ लिखा है
    आज के चुनावी दौर में कड़ा प्रहार

    जवाब देंहटाएं
  3. मूल पोस्ट से
    चार लाइन
    कॉपी,
    फिर पेस्ट!
    फिर वाह-वाह!

    (ताऊ जी की टिप्पणी से प्रेरित होकर)

    जवाब देंहटाएं
  4. कुर्सी की खातिर ये करता, पूजा, हवन, भजन है।
    तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।
    SUNDAR BHAV BHARI AAJKAL KE MAHOL MEN FIT KAVITA KE LIYE BADHAYEE.

    जवाब देंहटाएं
  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  6. मयंक भैय्या।

    अच्छा सटीक लिखा।

    कड़ा प्रहार किया।

    जवाब देंहटाएं

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