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मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

"गीत सरस सरसेंगे।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


कल्पनाओं में आओगे तो गीत सरस सरसेंगे।

बन कर बदली छाओगे तो, नीर सरस बरसेंगे।।


बुझे हुए अंगारों में तो, केवल राख मिलेगी।

शमशानों में ढूँढोगे तो, केवल खाक मिलेगी।।


मुझको पाओगे मेरी ही, रचना की परवाजों में।

मधुरिम शब्दों में पाओगे, गीतों की आवाजों में।।


जो बोया जाता है, उसको ही है काटा जाता।

कर्मों के अनुसार, पुण्य-फल को है बाँटा जाता।।


बेहोशी में पड़े रहे तो, प्राण निकल जायेंगे।

प्यार भरी मदहोशी में, अरमान फिसल जायेंगे।।


मौसम के काले कुहरे को, जीवन में मत छाने दो।

सुख-सपनों में कभी नही, इसको कुहराम मचाने दो।।


10 टिप्‍पणियां:

  1. जो बोया जाता है, उसको ही है काटा जाता।

    कर्मों के अनुसार, पुण्य-फल को है बाँटा जाता।।

    बहुत सार्थक बात कही आपने.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  2. जो बोया जाता है, उसको ही है काटा जाता।

    कर्मों के अनुसार, पुण्य-फल को है बाँटा जाता।।

    sachhi aur sunder baat keh di,yahi jeevan hai.

    जवाब देंहटाएं
  3. मुझको पाओगे मेरी ही, रचना की परवाजों में।

    मधुरिम शब्दों में पाओगे, गीतों की आवाजों में।।


    जो बोया जाता है, उसको ही है काटा जाता।

    कर्मों के अनुसार, पुण्य-फल को है बाँटा जाता।।

    बहुत ही बेहतरीन और सच्‍चाई पर आधारित हे आपकी ये नज्‍म बहुत बधाई

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति!

    जवाब देंहटाएं
  5. सुन्दर कविता के लिए
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  6. बुझे हुए अंगारों में तो, केवल राख मिलेगी।

    शमशानों में ढूँढोगे तो, केवल खाक मिलेगी।।

    बढिया है।

    जवाब देंहटाएं
  7. SHASTRI JI.
    AAPNE BAHUT ACHHI KAVITA
    PUBLISH KEE HAI.
    BADHAYEE

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत सुंदर रचना है ... धन्‍यवाद।

    जवाब देंहटाएं

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