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मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

"चम्पू काव्य" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)



आज गूँगा राष्ट्र क्यों अपना हुआ,


जबकि मन सैलाब बहना चाहता।


क्या कहें, किससे कहें, कैसे कहें?


एक वर्ग विशेष हमको रोकता।


बोलने वाले बने क्यों मूक हैं?


दासता में हम नही,


इतने कभी परतन्त्र थे।


क्योंकि वर्ग विशेष हमको,


बोलने को कह रहा था।


एक ही भाषा हमारी,


एक ही तो लक्ष्य था,


एकता के सुर सजा कर,


हम सभी धनवान थे।


सिन्ध से कन्याकुमारी तक,


यही आवाज थी,


तोड़ डालो दासता की बेड़ियाँ।



फिर हुआ आजाद अपना देश प्यारा,


राष्ट्र-भाषा एक घोषित हो गयी।


आज तक काले पुरुष,


गोरे मुखौटों को सजाये फिर रहे हैं,


है यह कैसी महान विडम्बना,


दासता के घन गगन पर घिर रहे हैं।


राज सिंहासन मिला,


हिन्दी के कारण।


किन्तु अब तक राष्ट्र की,


भाषा नही बन पाई है,


इसलिए यह कह रहा हूँ,


सो गया सन्तो का सपना।


आज गूँगा राष्ट्र अपना।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. Kalyug kaa charmotkarsh hai.
    Madhuyug ke aane kee koee khabar naheen hai.
    Apnaa-apnaa raag sabhee kaa, apnee-apnee dhaplee.
    Sabhee bhatakte phiren alakshayit,
    kaise paaen ek dagar.

    जवाब देंहटाएं
  2. किन्तु अब तक राष्ट्र की,

    भाषा नही बन पाई है,

    इसलिए यह कह रहा हूँ,

    सो गया सन्तो का सपना।

    आज गूँगा राष्ट्र अपना।।

    बिल्कुल सत्य कहा आपने.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  3. सवाल अच्छे उठाए हैं. और इन सबका जवाब एक ही है- जूता नहीं चलाया.

    जवाब देंहटाएं
  4. आपने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर
    की याद दिला दी।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत दिनों के बाद
    चम्पू काव्य पढ़ने को मिला।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  6. Champoo Kavya ke baare men kuchh suna jaroor tha.
    Aaj padh bhi liya.
    dhanyavad.

    जवाब देंहटाएं
  7. ब्लॉग पर शायद चम्पू काव्य आप ही लिखते हैं ।
    धन्यवाद ।

    जवाब देंहटाएं

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