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सोमवार, 13 अप्रैल 2009

"महान टिप्पणीकारों को प्रणाम करता हूँ।" (डॉ रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



इस पोस्ट को क्या शीर्षक दूँ?

लघु-कथा, हादसा या संस्मरण या शब्द-चित्र।


यदि कोई ब्लागर मित्र सही शीर्षक सुझायें तो उनका बड़ा उपकार होगा।


हिन्दी साहित्य के जाज्वलयमान नक्षत्र महान साहित्यकार


श्री विष्णु प्रभाकर जी के अस्त हो जाने पर कल मैंने अपनी

एक पोस्ट में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए

उन्हें अपनी भाव-भीनी श्रद्धांजलि समर्पित की थी।

मेरे एक ब्लागर मित्र ने इस पोस्ट को टिपियाते हुए लिखा था-


‘‘ ............................ शुक्रिया।’’

अब आप स्वयं ही विचार कर लें कि इतना महान साहित्यकार


इस दुनिया से चला गया है। तो उनके लिए श्रद्धांजलि लिखने में

कौन सी विपत्ति आ जाती।

मर जाने जैसे विषय पर "शुक्रिया!"


बहुत खूब।


-०-०--०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०

मेरे दूसरे ब्लागर मित्र ने तो कमाल ही कर दिया।


उन्होंने लिख मारा-


‘‘बहुत सुंदर .................. शास्त्री जी को मेरी भी श्रद्धांजलि।’’

इन्होंने तो मुझ जीते-जागते व्यक्ति को ही अपनी श्रद्धांजलि समर्पित कर दी।


खैर, मुझे "शुक्रिया" और "श्रद्धांजलि" दोनो ही स्वीकार हैं।


आशा है आप सभी टिप्पणीकार मुझ पर कृपादृष्टि बनाए रक्खेंगे।


कहिए जनाब!!


कैसी लगी आपको मेरी ये नई पोस्ट?


13 टिप्‍पणियां:

  1. टिप्पणी ’टिप्पणी-पुराण’ का दर्पण है।

    जवाब देंहटाएं
  2. डॉ. साहब,

    यदि, कुछ अर्ज करूं तो अन्यथा लिया जाना चाहिये. बस ऐसी ही भावनाओं में बह कर टिप्पणी की जाती है. और वैसे टिप्पणीकार(जिनसे आहत होकर आपको लिखना पड़ा) के लिये कभी विषय महत्वपूर्ण नही रहा, तब ज्ञान और समझ दूसरी बात है.

    अभी अभी ही गुड़-फ्रायडे गुजरा है, प्रभू यीशु के वचनानुसार "हे, प्रभू इन्हें क्षमा करना, यह नही जानते कि वह क्या कर रहे हैं"

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

    जवाब देंहटाएं
  3. भाई शाश्त्री जी, आपकी यह टिपणी वाली पोस्ट देखी, ... आवारा मसीहा... जैसे सादगी का भी मसीहा था..वैसे ही आपकी प्रति टिपणी वहां देखी..आप की सरलता और सादगी भी काबिले तारीफ़ है.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  4. क्षमा प्रार्थी हूं. ईश्वर करे, आप दीर्घायु हों.

    जवाब देंहटाएं
  5. क्षमा बड़न को चाहिये शास्त्री जी।

    जवाब देंहटाएं
  6. शास्त्री जी!
    टिप्पणीकारों का इरादा गलत नही था।
    बात को इतना तूल न दिया करें।

    जवाब देंहटाएं
  7. मयंक जी !
    भूलवश ऐसी गल्तियाँ हो ही जाती हैं।
    खैर, इससे एक लाभ यह भी हुआ है कि जल्दी बाजी में टिप्पणी करने से उपहास का पात्र बनना पड़ता है।

    जवाब देंहटाएं
  8. टिप्पणीकारों से निवेदन है कि वे अपनी टिप्पणी को प्रकाशित करने से पहले पढ़ जरूर लिया करें।

    जवाब देंहटाएं
  9. इससे तो आपकी आयु बढेगी शास्त्रीजी। वो तो आपके शुभचिंतकों की दुआ ही समझें :)

    जवाब देंहटाएं
  10. shastri ji,

    maine aaj hi dekha aapne meri tippani par itna kuch likh diya.
    mera aisa koi irada nhi tha jaisa aapne socha kyunki us waqt tak mujhe khud shri vishnu ji ke bare mein kuch pata hi nhi tha.aapke blog par unke bare mein pahli baar padha aur unke vishya mein jankari mili to laga ki unke bare mein itni achchi jankari ke liye aapka shukriya kar dun.
    shukriya shabd sirf isliye use kiya.
    vaise bhi jab hum kisi ke bare mein kuch nhi jante to jahan se bhi jankari milti hai to uska shukriya hi kiya jata hai.isiliye maine aapka shukriya ada kiya tha na ki shri vishnu ji ke bare mein kuch kaha tha.

    kripaya logon ka dhyan is ore aakarshit karein.kai baar aise hi arth ka anarth ho jata hai sirf samajh ke pher se.

    agar aap mujhse pooch lete to shayad aapko aisa nhi karna padta.

    जवाब देंहटाएं
  11. देखिए शास्त्री जी ऐसा तो ब्लॉग में टिप्पणी पाने के लिए होता आया रहा है। अभी मैंने अपनी रचना एक दूसरे ब्लॉग पर पढ़ी जहाँ पर लेख ने उसे अपने नाम से प्रकाशित किया है और सबने जिन्होने उसे कविता कोश पर पढ़ भी रखा है, उस रचना के लिए सौ-सौ बधाई दे डाली। अब आप समझ जाइए कि कौन कितनी शिद्दत से टिप्पणी करता है। मेरे पास तो ऐसे अनेक किस्से हैं।

    जवाब देंहटाएं

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