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सोमवार, 27 अप्रैल 2009

‘‘अपनी पुरानी डायरी से।’’ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

नभ में मयंक हँस रहा,

चाँदनी बिखरी है भूतल पर,

कितना सुहावना मौसम है।


मन से मन का मिलन हो रहा,

बजती तारों की शहनाई,

प्रेमी ने प्रेयसी को माला,

अपनी बाहों की पहनाई,

हरी घास मखमल के जैसी,

कमल तैरते निर्मल जल पर,

कितना सुहावना मौसम है।

प्रेम-प्रीत से सिंचित पौधों की,

डाली का पात हरा है,

पल्लव कुसुमों से बतियाते,

उपवन में मधुमास भरा है,

बहती सरिता स्वर भर कल-कल।

कितना सुहावना मौसम है।


तन-मन में उल्लास भरा है,

प्रेमांकुर गहरा पैंठा है,

आदर्शों के सिंहासन पर,

अन्तस में सपना बैठा है,

सभी स्वर्ग लाना चाहते है,

जीवन में, अपने बल पर।

कितना सुहावना मौसम है।


दुनिया सबको लगती प्यारी,

कोई इसको समझ न पाया,

सबकी उलझन न्यारी-न्यारी,

उलझन जग की समझ न पाया,

दिन में तारे देख रहे हैं,

आशाओं से , अम्बर तल पर।

कितना सुहावना मौसम है।

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी पूरी रचना...या यूँ कहूं सारी रचनाएं............गीत की तरह लयबद्ध लगती हैं जिन्हें पढने में और भी मजा आता है.........सब कड़ियों में यह भी एक सुन्दर रचना है

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  2. बहुत शानदार....पुरानी डायरी से भले ही निकलीं हों, भाव नये ही है.कभी-कभी पुरानी डायरी को पलटना कितना सुखद होता है.

    जवाब देंहटाएं
  3. jaadu se ghul jaate hai saare bhav mann mein,behad khubsurat rachana.

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत अच्छा लिखा आपने.. जरूर आपकी डायरी इसी तरह की सैकड़ों साहित्यिक सामग्री से भरपूर होगी..

    जवाब देंहटाएं
  5. मयंक, चाँदनी, शहनाई,
    कमल, पल्लव, मधुमास,
    कल-कल, उल्लास,
    प्रेमांकुर, सपना, अंतस-जैसे
    शब्द-पुष्पों से काव्य-हार बनाना
    किसी ब्लॉगर के बस की बात नहीं!
    शब्दों की यह जादूगरी तो
    एक "..........." ही कर सकता है!

    बूझो-बूझो-बूझो,
    मगज लगाकर बूझो!

    जवाब देंहटाएं
  6. नभ में मयंक हँस रहा,
    चाँदनी बिखरी है भूतल पर
    ,कितना सुहावना मौसम है।
    छायावादी कविताओं का सा लालित्य ,चित्रात्मकता व तत्सम शब्दावली से परिपूर्ण आपकी रचना सुंदर है .

    जवाब देंहटाएं

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