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गुरुवार, 5 मार्च 2009

विपत्ति आने पर धैर्य और बुद्धि से काम लेना चाहिए। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

विभुक्षिता किं न करोति पापम्,
क्षीणाः जनाः निष्करुणा भवन्ति।
त्वं गच्छ भद्रे प्रियदर्शनाय,
न गंगदत्तः पुनरेति कूपम्।।
उपरोक्त श्लोक का अर्थ लिखने से पूर्व एक छोटी सी कथा के माध्यम से ही इसे समझाने का प्रयत्न करता हूँ।
एक कुएँ में प्रियदर्शन नाम का साँप, भद्रा नाम की गोह तथा मेढकों का राजा गंगदत्त अपनी प्रजा के साथ रहते थे । तीनों परस्पर मित्रवत् व्यवहार करते थे। लेकिन जब प्रियदर्शन को भूख लगती थी तो वह एक मेंढक को खाकर अपनी क्षुधा शान्त कर लेता था। इस प्रकार गंगदत्त की प्रजा की संख्या दिन-प्रतिदिन घटती जा रही थी।
एक दिन ऐसा भी आया कि गंगदत्त की प्रजा के सभी मेंढक समाप्त हो गये। अब केवल गंगदत्त शेष रह गया। प्रियदर्शन को भूख सता रही थी और वह भूख के कारण निर्बलता अनुभव कर रह था।
अब उसने गंगदत्त से क्या कहा-यह संस्कृत के कवि ने साँप के मन की व्यथा को अपने श्लोक में लिखा- ‘‘विभुक्षिता किं न करोति पापम्,’’ कि हे मित्र गंगदत्त! मैं बहुत भूखा हूँ और भूख से मेरे प्राण निकले जा रहे हैं। अतः ‘‘विभुक्षिता किं न करोति पापम्,’’ भूखा क्या पाप नही करता।
और ‘‘क्षीणाः जनाः निष्करुणा भवन्ति।’’
भूख से कमजोर व्यक्ति के मन में करुणा (दया) समाप्त हो जाती है। इसलिए मित्रवर गंगदत्त मैं अपनी भूख मिटाने के लिए तुम्हें खाना चाहता हूँ।
अब तो गंगदत्त के सामने प्रियदर्शनरूपी मौत साक्षात् सामने दिखाई दे रही थी। गंगदत्त ने जब प्रियदर्शन की बात सुनी तो उसके तो पाँव के नीचे से जमीन ही खिसक गयी। किन्तु गंगदत्त मेंढकों का राजा था और बड़ा बुद्धिमान था। उसने प्रियदर्शन से कहा कि - ‘‘आप मेरे मित्र होकर मुझे खाना चाहते हैं तो खा लीजिए और अपनी क्षुधा शान्त कर लीजिए। परन्तु कल आप क्या खायेंगे?
प्रियदर्शन बोला- ‘‘मित्र! इसका तुम ही कोई उपाय बताओ जिससे कि कल को भी मेरे खाने का प्रबन्ध हो जाये।’’
अब गंगदत्त ने नीति से काम लिया और कहा-‘‘ मित्र तुम जानते हो कि मैं मेंढकों का राजा हूँ। पास के तालाब से मैं फिर अपनी प्रजा को ले आता हूँ । उनमें से तुम रोज एक मेंढक खा लिया करना और अपनी भूख मिटा लिया करना। परन्तु मैं इस कुएँ से बाहर कैसे निकल पाऊँगा।’’
प्रियदर्शन तो भूख से पागल था और अविवेकी भी हो गया था। इसलिए उसने अपनी मित्र भद्रा को पास बुला कर कहा कि -‘‘हे बहन भद्रा! तुम अपनी पीठ पर बैठा कर गंगदत्त को कुएँ से बाहर तालाब तक ले जाओ।
अतः भद्रा ने गंगदत्त को अपनी पीठ पर बैठाया और कुएँ से बाहर ले आयी।जैसे ही वह समीप के तालाब के पास पहुँची। उसकी पीठ पर बैठे गंगदत्त ने जोर की छलांग लगाई और तालाब में पहुँच कर बीच तालाब में से बोला-
‘‘त्वं गच्छ भद्रे प्रियदर्शनाय,
न गंगदत्तः पुनरेति कूपम्।’’
हे भद्रा तुम अब प्रिय दर्शन के पास चली जाओ। गंगदत्त अब पुनः उस कुएँ में जाने वाला नही है।
अर्थात विपत्ति के समय धैर्य
और
बुद्धि-विवेक से काम लेना चाहिए।

13 टिप्‍पणियां:

  1. bilkul sahi kaha aapne...........vipatti ke samay yahi sabse bade sambal aur hathiyar hote hain manushya ke.

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सही कहानी ्है जी, विपत्ति में धैर्य से काम लेने वाला ही सफ़ल होता है.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  3. कमाल कर दिया शास्त्री जी।

    कथा भी सुना दी और श्लोक का
    अर्थ भी स्पष्ट कर दिया।
    आपकी कलम की
    चतुराई को प्रणाम करता हूँ।

    जवाब देंहटाएं
  4. विभुक्षिता किं न करोति पापम्,
    क्षीणाः जनाः निष्करुणा भवन्ति।
    त्वं गच्छ भद्रे प्रियदर्शनाय,
    न गंगदत्तः पुनरेति कूपम्।।

    संस्कृत के श्लोक के माध्यम से
    प्रेरक कहानी बहुत अच्छी लिखी है।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  5. आज ब्लाग पर इस प्रकार के
    सन्देश देने वाली कहानियाँ
    कम ही देखने को मिलतीं है।
    आपको अच्छे लेखन के लिए,
    मुबारकवाद।

    जवाब देंहटाएं
  6. सुन्दर एवं रोचक कथा के लिए
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  7. मित्रों को इस कहानी से शिक्षा लेकर
    दुष्टता की आदत त्याग देनी चाहिए।

    जवाब देंहटाएं
  8. संस्कृत के साथ हिन्दी भाषा का मिश्रण, अच्छा लगा। प्रेरक कथा के लिए धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  9. इस प्रकार की प्रेरक कहानियाँ तो
    प्रकाशित होनी ही चाहिए।

    बधाई......बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  10. बहुत शिक्षाप्रद कथा है शास्त्री जी.

    जवाब देंहटाएं
  11. अच्छी उपदेशात्मक कहानी है।
    अगर गंगदत्त अपनी तरह
    अपने सगे-संबंधियों को भी बचा लेता,
    तो कुछ और बात होती।

    यह कहानी इस कटु सत्य को भी
    उजागर करती है कि
    कोई कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो,
    उसका विवेक
    तब ज़्यादा अच्छी तरह से जागता है,
    जब उसकी अपनी जान पर
    बन आती है या स्वयं
    उसके ऊपर मुसीबत आती है।

    जवाब देंहटाएं

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