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बुधवार, 25 मार्च 2009

बाबा नागार्जुन का एक रूप ऐसा भी- (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)


चित्र में- (खड़े हुए) टीकाराम पाण्डेय एकाकी

डा0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक, बाबा नागार्जुन, देवदत्त प्रसून (चारपाई पर बैठे हुए)



इस संस्मरण को लिखने का मेरा उद्देश्य है कि बाबा नागार्जुन के मन में कहीं यह जरूर छिपा हुआ था कि देश के भावी कर्णधार शिक्षित हों। भारत अन्य देशों की तुलना में शिक्षा में पिछड़ा हुआ न हो। साथ ही विद्यार्थियों को इससे प्रेरणा भी मिले कि उन्हें परीक्षा में प्रथम-श्रेणी उत्तीर्ण होना चाहिए। शायद यही प्रेरणा उस महान विभूति की थी कि मेरा बड़ा पुत्र हाई-स्कूल के बाद इण्टर में भी प्रथम श्रेणी मे ही पास हुआ।


आज बाबा को साथ लेकर जाना था पीलीभीत जिले के मझोला कस्बे में। मझोला कस्बे में को-आपरेटिव शुगर फैक्ट्री में एक साहित्य विभाग भी था। यह विभाग बनवाने में पीलीभीत के महान साहित्य-सेवी स्व0 रोशन लाल शर्मा का योगदान था। इसके पीछे उनकी यह सोच थी कि इससे किसी गरीब साहित्यकार के बच्चों और उसके परिवार का पेट-पालन होगा और दूसरी बात यह थी कि फैक्ट्री की स्टेशनरी की खरीद-फरोख्त, उसकी प्रिंटिंग तथा पत्र पत्रिकाओं में फैक्ट्री के विरुद्ध या अनुकूल जो कुछ छप रहा है, उस पर दृष्टि रखना व उसका जवाब देना।


इसी शुगर फैक्ट्री में एक मदन विरक्त भी थे। उन दिनों वे इसके साहित्य विभाग में सम्पादक के पद पर नियुक्त थे। वे बाबा से बहुत लगाव रखते थे। एक दिन वे भी बाबा से मिलने के लिए आये। बाबा से बतियाते रहे और मझोला शुगर फैक्ट्री में कवि-गोष्ठी आयोजित करने के लिए बाबा से अनुमति ले ली।


रविवार के दिन मझोला शुगर फैक्ट्री के गेस्ट-हाउस में गोष्ठी निश्चित हो गयी। बाबा के सुझाव पर गोष्ठी भी ऐसी वैसी नही उच्च-कोटि की रखी गयी। बाबा ने कहा था कि गोष्ठी में क्षेत्र के उन सभी विद्यार्थियों को बुलाना है जिन्होंने 10वीं या 12वीं की परीक्षा में प्रथम श्रेणी प्राप्त की हो। बस अपनी मार्क-शीट की फोटो स्टेट कापी जमा करनी होगी। शुगर फैक्ट्री की ओर से इन सब विद्यार्थियों को पुरस्कार भी बाबा के ही कर-कमलों से दिलवाया गया। मेरे ज्येष्ठ-पुत्र नितिन को भी हाई-स्कूल में प्रथम श्रेणी लाने पर एक कांस्य मैडल व प्रमाण पत्र बाबा के कर कमलों से दिया गया था।


गोष्ठी में टीकाराम पाण्डेय एकाकी, देवदत्त प्रसून, वाचस्पति जी, डा0 शम्भू शरण अवस्थी, गेन्दालाल शर्मा निर्जन, डा।रूपचन्द्र शास्त्री मयंक, ध्रुव सिंह धु्रव, रवीन्द्र पपीहा, रामदेव आर्य, मदन विरक्त, फैक्ट्री के तत्कालीन प्रशासक (जिलाधिकारी-पीलीभीत),विजय कुमार, खूबसिंह विकल, अम्बरीश कुमार आदि ने भाग लिया।


गोष्ठी के संयोजक मदन विरक्त ने तो -

‘‘वीरों की माता हूँ, वीरों की बहना।

पत्नी उस वीर की हूँ, शस्त्र जिसका गहना।’’

का सस्वर पाठ किया। जिसकी बाबा ने भूरि-भूरि प्रशंसा की।


इसके बाद बाबा ने अपनी रचना ‘अकाल और उसके बाद’


कई दिनो तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास,

कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास,

कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त,

कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकश्त।


दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद,

धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद,

चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद,

कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।

का पाठ किया और इसकी एक-एक लाइन की व्याख्या करके सुनाई।



8 टिप्‍पणियां:

  1. बाबा के प्रेरणादायी संस्मरणों का सिलसिला अनवरत चलता रहे. यही गुजारिश है.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  2. blog par pahali baar aaana hua .. yah jaankar khushi hui kii aap bhi uttarakhand se hai.. sahity ko blog ke madhyam se samiridh karne ka prayas kar rahe hai....

    जवाब देंहटाएं
  3. हम बाबा के संस्मरणों से कुछ न कुछ हर बार सीख रहे हैं। आप लिखते रहें।

    जवाब देंहटाएं
  4. मयंक जी!
    बाबा नागार्जुन की संस्मरण श्रंखला
    रोचक हैं, सच्ची है।
    इस क्रम को जारी रखें।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  5. मित्रवर मयंक जी।
    आप मेरे एम0ए0 के सहपाठी हो।
    उन दिनों की जाने कितनी खट्टी-मीठी
    यादें मन में समाई हुई हैं।
    बाबा नागार्जुन के साथ आपने
    मेरा चित्र प्रकाशित किया।
    आभारी हूँ।

    जवाब देंहटाएं
  6. आपके ही कारण बाबा से मेरा भी
    परिचय हो गया था।
    मेरी बधाई स्वीकार करें।
    DINESH PANDEY

    जवाब देंहटाएं
  7. शास्त्री जी ।
    बाबा का संस्मरण रोचक
    तथा प्रेरणा देने वाला है।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  8. सुनो जी!
    कल को मैं भी बाबा के कुछ
    और संस्मरण आपको सुनाऊँगी।
    उन्हें भी प्रकाशित कर देना।

    जवाब देंहटाएं

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