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सोमवार, 16 मार्च 2009

मूछ वाणी । (कुण्डलियाँ छन्द में कुछ पुरानी रचनाऐं) (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

(१)

आभूषण हैं वदन का, रक्खो मूछ सँवार,

बिना मूछ के मर्द का, जीवन है बेकार।

जीवन है बेकार, शिखण्डी जैसा लगता,

मूछदार राणा प्रताप, ही अच्छा दिखता,

कह ‘मंयक’ मूछों वाले, ही थे खरदूषण ,

सत्य वचन है मूछ, मर्द का है आभूषण।

(२)


पाकर मूछें धन्य हैं, वन के राजा शेर,

खग-मृग सारे काँपते, भालू और बटेर।

भालू और बटेर, केसरि नही कहलाते,

भगतसिंह, आजाद मान, जन-जन में पाते।

कह ‘मयंक’ मूछों से रौब जमाओ सब पर,

रावण धन्य हुआ जग में, मूछों को पा कर।

(३)

मूछें बिकती देख कर, हर्षित हुआ ‘मयंक’,

सोचा-मूछों के बिना, चेहरा लगता रंक।

चेहरा लगता रंक, खरीदी तुरन्त हाट से,

ऐंठ-मैठ कर चला, रौब से और ठाठ से।

कह ‘मंयक’ आगे का, मेरा हाल न पूछें,

हुई लड़ाई, मार-पीट में, उखड़ गई थी मूछें।

12 टिप्‍पणियां:

  1. सही बन पड़ी है मूँछ पुराण जी.

    जवाब देंहटाएं
  2. बिन मूछों के क्या ? अच्छा चित्रण सर जी । बधाई

    जवाब देंहटाएं
  3. शास्त्री जी,
    बहुत खूब कहा आपने ..मूंछ नहीं तो कूछ नहीं !!!!!!!!

    जवाब देंहटाएं
  4. चेहरा लगता रंक, खरीदी तुरन्त हाट से,

    ऐंठ-मैठ कर चला, रौब से और ठाठ से।

    कह ‘मंयक’ आगे का, मेरा हाल न पूछें,

    हुई लड़ाई, मार-पीट में, उखड़ थी मूछें।

    वाकई नत्थूलाल की मूंछों की कहावत अब समझ आई जॊ.:)

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  5. मूछ वन्दना, वाकई नया टाॅपिक है।
    इस पर कलम चलाने के लिए,
    शुक्रिया।

    जवाब देंहटाएं
  6. शास्त्री जी ।
    मूछों की कुण्डली में
    रावण और कुम्भकरण का
    तो जिक्र है परन्तु नत्थूलाल
    की मूछें तो आप भूल ही गये हैं।

    जवाब देंहटाएं
  7. जनाब!
    जिस समय यह रचनाएँ लिखीं गयी थीं ।
    उस समय तो नत्थूलाल पैदा भी नही हुए थे।

    जवाब देंहटाएं
  8. मूछों पर पुराने छंद में
    पहली बार ब्लाग पर
    कुछ लिखा देखा।
    अच्छा है ।

    जवाब देंहटाएं
  9. पुराने छंद अभी भी अच्छे लगते हैं।
    गिरधर की कुण्डलियों की आपने
    याद ताजा कर दी।
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  10. आपके ब्लाग पर मूछें
    देख कर अच्छा लगा।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं

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