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मंगलवार, 31 मार्च 2009

"आ जाओ अब तो पास प्रिये!" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)



मन मेरा बहुत उदास प्रिये!


आ जाओ अब तो पास प्रिये!



मेरे वीराने मधुवन में,


सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों?


जीवन पथ पर आगे बढ़ना,


बोलो मुझको सिखलाया क्यों?


अपनी साँसों के चन्दन से,


मेरे मन को महकाया क्यों?


तुम बन जाओ मधुमास प्रिये!


आ जाओ अब तो पास प्रिये!



मन में सोई चिंगारी को,


ज्वाला बनकर भड़काया क्यो?


मधुरिम बातों में उलझा कर,


मुझको इतना तडपाया क्यों?


सुन लो आकर अरदास प्रिये!


आ जाओ अब तो पास प्रिये!



सपनों मे मेरे आ करके,


जीवन दर्शन सिखलाया क्यों?


नयनों में मेरे छा करके,


जगमग नभ को दिखलाया क्यों?


कर लो अब तो विश्वास प्रिये।


आ जाओ अब तो पास प्रिये!!


13 टिप्‍पणियां:

  1. dil cheer kar rakh diya aapki is kavita ne..........kaun sa dard undel diya ,kya kahun.........ik azab , anokha sa bahut hi karibi ahsaas hai is kavita mein.
    tarif ke liye shabd hi kam pad jate hain.

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह शाश्त्री जी, बहुत ही भाव्प्रवण रचना है, दिल अति प्रशन्न हुआ. धन्यवाद.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  3. सुंदर कविता। भावपूर्ण अनुग्रह की सुंदर अभिव्यक्ति।

    जवाब देंहटाएं
  4. आ जाओ अब तो पास प्रिये!

    अब यहीं रहो,
    कुछ नहीं कहो,
    बस मुझे देखकर मुस्काओ!

    मैं जी न सकूँगा
    अब तुम बिन,
    अब मेरे घर में बस जाओ!

    जवाब देंहटाएं
  5. शास्त्री जी! आपका गीत बहुत लाजवाब है।
    मुबारकवाद।

    जवाब देंहटाएं
  6. मयंक जी!
    गीत अच्छा है,
    सदाबहार है।
    लिखते रहें,
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  7. शास्त्री जी!
    ब्लाग पर सुन्दर रचना
    प्रकाशित करने के लिए,
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  8. मयंक जी!
    आपकी रचना सुन्दर है।

    जवाब देंहटाएं
  9. गीतों की श्रंखला में यह गीत उत्कृष्ट है।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  10. सुन्दर गीत के लिए,
    बधाईओ

    जवाब देंहटाएं
  11. आपकी इत्ती शानदार कविता को पढ हमारे मन मे भी एक प्रेम भरी कविता उछाले मारने लगी है . सो आप बुरा ना माने हम भी कल इसी धुन पर ही ठेले ही देगे . :)

    जवाब देंहटाएं

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