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शनिवार, 28 मार्च 2009

‘‘समय का फेर’’ - (डा. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)



पहले का आदमी कर्मशील था,
कहलाता था निष्कामी।
आज का आदमी अकर्मण्य है,
और कहलाता है कामी।

9 टिप्‍पणियां:

  1. सून्दर प्रयास। बहुत बहुत बधाई

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  2. और कहलाता है कामी देखी सूरत वही लुढ़का.
    इसी लिए विश्वास करता कोई नहीं उसका.
    सोच को गहरा कर के गंभीर होना होगा.
    नहीं तो दिन प्रतिदिन और भी पतन होगा.

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह डॉ.साहब आपने तो गागर में सागर भर दी! आदमी होकर भी आदमी नहीं है आदमी। बधाई ये मेरे लिए थॉट ऑफ थे डे है।

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह शाश्त्री जी, बडी कमाल की और सटीक परिभाषा दी आपने.

    रामराम.

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  5. thode shabdon mein kahne ki kala to koi aapse seekhe.
    aap to kalam ke jadugar hain.

    जवाब देंहटाएं
  6. कम शब्दों में बड़ी बात।
    मैं आपका फैन हो गया हूँ।

    जवाब देंहटाएं
  7. सुन्दर क्षणिका,
    प्रस्तुत करने के लिए बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  8. मुझे यह क्षणिका से भी छोटी
    ‘‘सीपिका’’ दिखाई देती है।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  9. आपकी कलम में जादू है।
    ब्लाग की दुनियाँ में बहुत देर से आये
    और आते ही हल-चल मचा दी।
    शुभकामनाएँ।

    जवाब देंहटाएं

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