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शनिवार, 14 मार्च 2009

तीस-पैंतीस वर्ष पूर्व लिखी एक कविता । (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)



पागल हो तुम मेरी प्रेयसी,


मैं तुमको समझाऊँ कैसे?


पल-पल सुलग-सुलग जलता हूँ,


यह तुमको बतलाऊँ कैसे?



चन्दा और चकोरी जैसा,


मेरा और तुम्हारा नाता,


दोनों में है दूरी इतनी,


मिलन कभी नही है हो पाता,


दूरी की जो मजबूरी है,


मजबूरी जतलाऊँ कैसे?


पागल हो तुम मेरी प्रेयसी,


मैं तुमको समझाऊँ कैसे?



बाहर बजती हैं शहनाईं,


लेकिन अन्तर्मन रोता है,


सूख गये आँसू आँखों में ,


पर दिल में कुछ-कुछ होता है,


विरह व्यथा जो मेरे मन में,


बोलो उसे छिपाऊँ कैसे?


पागल हो तुम मेरी प्रेयसी,


मैं तुमको समझाऊँ कैसे?



बसन्त ऋतु में, सुमन खिलें हैं,


पर मन में मधुमास नही है,


लाश ढो रहा हूँ मैं अपनी,


जीवन में कुछ रास नही है,


कदम डगमगाते हैं अब तो,


अपनी मंजिल पाऊँ कैसे?


पागल हो तुम मेरी प्रेयसी,


मैं तुमको समझाऊँ कैसे?

11 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी स्मृतियों का हाल सुनाने के लिए शुक्रिया ....

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी रचना अभी भी जवान है।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  3. मयंक जी!
    आपकी पुरानी रचना बहुत सुन्दर है।
    अब तक इसे कहाँ छिपा कर रखा था।

    जवाब देंहटाएं
  4. पुराने चावल तो पुराने होकर
    ज्यादा महक जाते हैं।
    सुन्दर रचना के लिए,
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  5. पुरानी रचना आज भी नयी लगती है।
    शुभकामनाएँ।

    जवाब देंहटाएं
  6. मन की विरह व्यथा को
    बाखूबी बयान करती कविता के लिए,
    मुबारकवाद।

    जवाब देंहटाएं
  7. पागल हो तुम मेरी प्रेयसी,
    मैं तुमको समझाऊँ कैसे?
    पल-पल सुलग-सुलग जलता हूँ,
    यह तुमको बतलाऊँ कैसे?

    अच्छा विरह गीत है।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  8. kya masumiyat bhari , dil ke har jazbaat ko ukerti rachna likhi hai shastri ji.
    us waqt ki likhi huyi rachna us waqt ke jazbaat bhi bayan karti hai.
    har shabd dil ko choo gaya hai.
    na jaane kitni baar padh li hai.
    aur na jaane kitni baar aur padh lungi.
    mujhe aapki ye kacita bahut hi pyari lagi......shayad dil ke bahut kareeb si lagi.

    जवाब देंहटाएं
  9. वाह जी सच्चे प्रेमी के मन की बात लिख दी, सुन्दर!

    ---
    चाँद, बादल और शाम
    गुलाबी कोंपलें

    जवाब देंहटाएं

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