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शनिवार, 28 मार्च 2009

प्यार करने का जमाना आ गया है। (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)







हसरतें छूने लगी आकाश को,


पत्थरों को गीत गाना आ गया है।



मूक स्वर थे कण्ठ भी अवरुद्ध था,


वन्दना में सुर सजाना आ गया है।



लक्ष्य मुश्किल था बहुत ही दूर था,


साधना मुझको निशाना आ गया है।



मन-सुमन वीरान उपवन थे पड़े,


अब गुलों को चहचहाना आ गया है।



हाथ लेकर हाथ में जब चल पड़े,


साथ उनको भी निभाना आ गया है।



जिन्दगी के जख्म सारे भर गये,


प्यार करने का जमाना आ गया है।


9 टिप्‍पणियां:

  1. मन-सुमन वीरान उपवन थे पड़े,
    अब गुलों को चहचहाना आ गया है।
    bahut hi sunder bhav khubsurat

    जवाब देंहटाएं
  2. शास्त्री जी।
    सुन्दर गीत के लिए,
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  3. मयंक जी।
    गीत में भाव सुन्दर हैं । सबसे बड़ी विशेषता हैं कि लयबद्धता का कही भी हा्रस नही हुआ है।

    जवाब देंहटाएं
  4. शुभकामनाएँ।
    आपका गीत मनमोहक है।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  5. आजकल ब्लाग पर कम ही लोग
    ऐसे गीत लिखते हैं।

    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  6. *मयंक जी,
    सुन्दर और सरल गीत है।

    *"हंगामा जी",
    एक नज़र इस पर दें, उन कुछ कम लोगों में से एक।

    http://sachmein.blogspot.com/2009/03/blog-post_06.html

    जवाब देंहटाएं
  7. zindagi ke zakhm sare bhar gaye
    pyar karne ka zamana aa gaya hai

    hasratein choone lagin aakash ko
    pattharon ko geet gana aa gaya hai

    kya khoobsoorat bhav hain............padhkar laga jaise

    humko bhi gungunana aa gaya hai
    aapka andaz-e-bayan humko bha gaya hai

    जवाब देंहटाएं
  8. आनंद आया पढ़कर। अच्‍छी रचना।

    जवाब देंहटाएं

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