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गुरुवार, 26 मार्च 2009

"तुम तो अखबार पढ़ना भी नही जानते" - बाबा नागार्जुन! (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)



मेरी 6 जुलाई 1989 की सुबह, बाबा नागार्जुन की से डाँट से शरू हुई। प्रातःकाल अखबार बाँटने वाला नित्य की तरह अखबार डाल कर गया। मैं अखबार पढ़ने लगा।
बाबा भी पास ही बैठे थे। मैंने पाँच मिनट में सुर्खियाँ देख कर अखबार रख दिया ।
बाबा बोले- ‘‘शास्त्री जी! आपने अखबार पढ़ लिया।’’
मैंने कहा- ‘‘जी बाबा !
‘‘बाबा ने कहा- ‘‘आपको अखबार भी ढंग से पढ़ना नही आता।‘‘
मैंने उत्तर दिया- ‘‘बाबा आप ये क्या कह रहे हैं? अखबार कैसे पढ़ूँ ? आप ही बता दीजिए।’’
बाबा बोले - ‘‘देखो सबसे पहले समाचार पत्र में जो चित्र छपे होते हैं। उनको देखना जरूरी होता है। उसके बाद ही सुर्खियाँ पढ़ी जाती हैं। आपने तो सरसरी नजर से सिर्फ हेड-लाइन्स पढ़ जी और अखबार का काम तमाम कर दिया।’’
बाबा ने कहा- ‘‘मुझे भी इस अखबार की कुछ खबरें सुनाओ।’’
मैंने उन्हें समाचार पत्र पढ़कर सुनाना शुरू कर दिया। बाबा की नजर उम्र के इस पड़ाव में जवाब दे चुकीं थी। इसलिए वे मैग्नेफाइंग-ग्लास से ही थोड़ा-बहुत लिख पढ लेते थे।
बाबा ने अपने हाथ में मैग्नेफाइंग-ग्लास पकड़ा हुआ था।
सबसे पहले उन्होंने अखबार में छपे चित्रों को देखा और उसके नीचे लिखा विवरण मुझसे सुना।
अब बाबा को पूरा अखबार सुनाना था। मैंने अखबार सुनाना शुरू किया। सबसे पहले हत्या और लूट-पाट की एक बड़ी खबर लगी थी।
बाबा ने अनमने ढंग उसे सुना। इसके बाद स्थानीय खबरें थीं। बाबा ने उन्हे भी सुनना पसन्द नही किया। अब गैंग-रेप की एक घटना थी।
बाबा ने कहा- आगे बढ़ो।
बाबा नागार्जुन ने कौन सी खबरें पसन्द कीं थी । यही मैं बताने जा रहा हूँ।
अखबार के बीच में एक पन्ना होता है, जिसमें सम्पादकीय होता हैं।
पहले तो बाबा ने उसे सुना। उसके बाद इस पन्ने पर राजनीतिज्ञों और वरिष्ठ पत्रकारों ने जो कुछ लिखा था। वो सब बाबा ने सुना। जिसे कि कुछ ही लोग पढ़ते हैं।
बाबा ने मुझे समझाया- ‘‘शास्त्री जी अखबार पढ़ने का यही सही तरीका है। जब एक रुपया खर्च कर रहे हो तो ढाई आने की बात क्यों पढते हो? पूरे रुपये का मजा लो। एक बात ध्यान में सदैव रखना कि अखबार मनोरंजन का ही साधन नही है। यह ज्ञानवर्धन का साधन भी है।’’

13 टिप्‍पणियां:

  1. बाबा नागार्जुन का कहना सही है ... अखबार के बीच वाले पन्‍ने पर ... जिसमें संपादकीय और किसी विषय के विशेषज्ञ के विश्‍लेषणात्‍मक आलेख ... दोनो ही छपे होते है ... पढना सबसे अधिक ज्ञानवर्द्धक होता है ... बाकी पन्‍नों में तो समाचार की रिपोर्टिंग होती है ... जिसे न भी पढा जाए ... तो कहीं न कहीं से मालूम हो ही जाता है।

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  2. बहुत सही कहा बाबा ने. अखबार पढो तो मर्म भी पढ ही लो उसका.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  3. सही कहा अखबार ही तो हमें दुनिया से परिचित करवाता है ...अच्छा लगा यह शुक्रिया

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह शास्त्री जी, ये नायाब मोती चुनकर लाए आप यादों की पोटली से।
    आगे इंतजार है...

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  5. baba ka kehna sahi hai..........akhbar ke poore paise tabhi to vasool hote hain jab kuch gyanvardhak jankari mile.

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  6. सही बात है कही बाबा ने ...ज्यादातर ऐसे ही होते हैं

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
  7. मयंक जी।
    आपके संस्मरण बहुत रोचक हैं।
    मुझे भी इससे पूरा अखबार पढ़ने की
    प्रेरणा मिली है।
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  8. शास्त्री जी।
    बाबा नागार्जुन पर आपकी श्रंखला का
    यह उत्कृष्ट संस्मरण है।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  9. उच्चकोटि के संस्मरण के लिए
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  10. मयंक जी।
    संस्मरण रोज प्रकाशित किया करें।
    अच्छा लगता है।

    जवाब देंहटाएं
  11. शास्त्री जी।
    अब तो मेरे बच्चे भी इसको
    पढ़ने में रुचि लेने लगे हैं।
    बधाई।

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  12. हमारे शिक्षक और गुरु भी यही कहा करते थे। समाचार पत्र के संपादकीय से ही तो पूरे समाचार पत्र की विचारधारा, श्रेष्ठता, निष्पक्षता का अनुमान लगता है।

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  13. मैं तो खबरें कभी कभार ही पढता हूँ. संपादकीय के लिए ही अखबार खरीदता हूँ. एकबार तो अखबारवाले ने कहा की आप कहें तो किसी और के अख़बार से सिर्फ वो पेज निकाल के आपको दे दिया करूंगा, १०-१५ रुपये दे देना. वैसे भी उसे पढता कौन है.

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