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बुधवार, 18 मार्च 2009

मेरा वन्दन स्वीकार करो। (डॉ,रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


तुम बिन सूना मेरा आँगन,

बाट जोहता द्वार।

उर में करो निवास शारदे,

मन के हरो विकार।।








मेरा वन्दन स्वीकार करो।

माँ बस इतना उपकार करो।।

मुझमें कोई विज्ञान नही,

कविता का कुछ भी ज्ञान नही,

अपनी त्रुटियों का भान नही,

मानस में मधुर विचार भरो।

माँ बस इतना उपकार करो।।

मुझमें भाषा चातुर्य नही,

शब्दों का भी प्राचुर्य नही,

वाणी में भी माधुर्य नही,

छन्दों को तुम साकार करो।

माँ बस इतना उपकार करो।।

तुलसी जैसी है भक्ति नही,

मीरा सी है आसक्ति नही,

मुझमें कोई अभिव्यक्ति नही,

छल-छद्म-प्रपंच विकार हरो।

माँ बस इतना उपकार करो।।


10 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर ! आप तो वैसे ही इतना सुन्दर लिख रहे हैं।
    घुघूती बासूती

    जवाब देंहटाएं
  2. सर जी , सुन्दर रचना । भक्तिमय वातावरण में । शुभकामनाएं

    जवाब देंहटाएं
  3. मन आह्लाद से भर गया इस भक्ति रस से ओत प्रोत प्रार्थना को पढ़कर....बहुत ही सुन्दर रचना रची आपने....

    .माँ शारदे हम सबके उर के अन्धकार का शमन कर सबका कल्याण करें....

    जवाब देंहटाएं
  4. मयंक जी।
    सरस्वती वन्दना बहुत
    सुन्दर शब्दों में लिखी है।

    माँ शारदे का
    आशीष सबको मिले।

    जवाब देंहटाएं
  5. bahut hi sunder vandana haividhya ki devi ki ,mann prasann hua padhke,sunder chitra hai maa ka.

    जवाब देंहटाएं
  6. mera bhi vandan sweekar karen shastri ji...........hridaya dravibhoot ho gaya...........prarthna ho to aisi..........ma hum sab par kripa karein.

    जवाब देंहटाएं
  7. Sir,
    Aapne SHARDE MATA ka jitana sunder chitra lagayaa hai, utani hi sunder VANDANA bhi prastut ki hai.
    badhayee.

    जवाब देंहटाएं
  8. मयंक जी!
    माँ सरस्वती की वन्दना आपने
    बहुत सुन्दर लिखी है।
    माता का चित्र भी
    सुन्दर और भव्य है।
    शुभकामनाएं.

    जवाब देंहटाएं

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