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रविवार, 29 मार्च 2009

‘प्रियवर निन्दक’ के अनुरोध पर


अपने एक अन्तरंग युवा मित्र


‘प्रियवर निन्दक’ के अनुरोध पर


मैंने उसके गद्य में लिखे भावों को


केवल कुछ पंक्तियों में बाँधा है।


‘मधुरिमा’ ने उसके भाव पढ़ लिए होंगे।






जिन्दगी में सुमन, सुन्दर खिल गये हैं,


जब से मन के तार,उनसे मिल गये हैं।


लाल, पीले, हरे रंग, भाने लगे हैं,


स्वप्न सुख के नयन में, छाने लगे हैं।


शब्द का संसार, अधरों में समाया है,


जबसे उनसे अपना दिल मैंने मिलाया है।


भाव सब परिकल्पना, में खो गये हैं,


अब प्रिये! हम तो तुम्हारे हो गये हैं।


वन्दना, आराधना और प्यार से,


गुल महकता है बड़ी मनुहार से।



11 टिप्‍पणियां:

  1. aapki likhi panktiyan har bhav ko ujagar kar rahi hain..........chahe wo kisi ke bhi hon magar bhavon ko aapne khoob pakda hai aur shabdon mein dhala hai.

    जवाब देंहटाएं
  2. SIR JI!
    MAIN TO AAPKO DHANYAWAD HI DE SAKTA HOON.
    SAATH HI AAPKA AABHARI
    BHI HOON KI AAPNE MAIL SE
    BHEJA MERE BHAAVON KO
    KAVITA BANA KAR PRASTUT KIYA.
    EK BAA FIR THANX.

    जवाब देंहटाएं
  3. शास्त्री जी!
    आखिर आपने निन्दक प्यारा की
    अपील सुन ही ली।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  4. स्क्रिप्ट चाहे निन्दक की हो या
    किसी और की बधाई के पात्र आप ही हैं।

    जवाब देंहटाएं
  5. आपने निन्दक के भावों को
    अच्छे शब्द दिये हैं।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  6. कविता अच्छी बन पड़ी है।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  7. सुन्दर शब्दों में लिखी कविता के लिए,
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  8. बेहद खूबसूरत भाव और शब्द सं्योजन तो आपका लाजवाब हमेशा ही होता है. शुभकामनाएं.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत सुंदर बन गयी है यह कविता।

    जवाब देंहटाएं
  10. सुन्दर शब्द संयोजन , ख़ूबसूरत भाव .../

    जवाब देंहटाएं

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