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शुक्रवार, 27 मार्च 2009

‘‘स्वागत है नव-सम्वत्सर का’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)





मंजुल पुष्पों की गन्धों से, महकें जीवन बन चन्दन।


नव-सम्वत्सर का हम, करते हैं स्वागत-अभिनन्दन।।



पावन वसुन्धरा पर सुख की, हरियाली छा जायें।


समय-समय पर मेघ-घटा, जल और अन्न बरसायें।।



प्रेम-एकता, सत्य-शान्ति की, निर्मल धारा सदा बहे।


असत्य-हिंसा, वैर-भाव, नही कभी किसी के पास रहे।।



आड़ धर्म की लेकर, भारत में नही कोई दंगा हो।


जन,गण,मन हो वैभवशाली, कोई न भूखा-नंगा हो।।



प्यार करें भारत-माता को, जो भी यहाँ निवासी हैं।


याद रहे यह सबसे पहले, हम भारत के वासी हैं।।



कभी ठेस नही पहुँचाना, महापुरुषों की अभिलाषा को।


सब धर्मों का मान करें, और प्यार करें भाषा को।।



लेकिन याद सदा ये रखना, अपनी भाषा हिन्दी है।


भारत माता के माथे की, ये ही पावन बिन्दी है।।



मंगलदायी सम्वत्सर हो, छाया सुखद सवेरा हो।


उर में हों उर्वशी उमंगें, सुख का सघन बसेरा हो।।



12 टिप्‍पणियां:

  1. आपको भी नव संवत्सर की शुभ कामनाएं!

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया रचना . नवरात्र पर्व की शुभकामना

    जवाब देंहटाएं
  3. शास्त्री जी!
    नव-वर्ष पर अच्छी कविता के लिए,
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  4. नव सम्वत्सर की
    आपको ढेरों बधाइयाँ।

    जवाब देंहटाएं
  5. मयंक जी।
    कविता भाव पूर्ण हैं।
    नव सम्वत्सर की आपको बधाइयाँ।

    जवाब देंहटाएं
  6. शास्त्री जी !
    नव सम्वत्सर की बधाई स्वीकार करें।

    जवाब देंहटाएं
  7. रोचक कविता।
    नव सम्वत्सर के लिए बधाई।

    जवाब देंहटाएं

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