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गुरुवार, 4 जून 2009

‘‘कूलर’’ (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


ठण्डी-ठण्डी हवा खिलाये।

इसी लिए कूलर कहलाये।।

जब जाड़ा कम हो जाता है।

होली का मौसम आता है।।

फिर चलतीं हैं गर्म हवाएँ।

यही हवाएँ लू कहलायें।।

तब यह बक्सा बड़े काम का।

सुख देता है परम धाम का।।

कूलर गर्मी हर लेता है।

कमरा ठण्डा कर देता है।।

चाहे घर हो या हो दफ्तर।

सजा हुआ है यह खिड़की पर।।

इसकी महिमा अपरम्पार।

यह ठण्डक का है भण्डार।।

जब आता है मास नवम्बर।

बन्द सभी हो जाते कूलर।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

8 टिप्‍पणियां:

  1. अरे वाह, कूलर का कवितामय परिचय अच्छा लगा।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

    जवाब देंहटाएं
  2. bahut khoob sach kaha hai.
    तब यह बक्सा बड़े काम का।
    सुख देता है परम धाम का।।

    जवाब देंहटाएं
  3. अपने परिवेश की वस्तुओं पर अपने अनुभव से कविता बनाना सचमुच रोचक है

    ---
    तख़लीक़-ए-नज़र

    जवाब देंहटाएं
  4. आज ही नया कूलर खरीदा
    और
    आज ही आपकी यह
    सुंदर कविता पढ़ने को मिल गई!

    कूलर की हवा में ही बैठकर
    टिप्पणी कर रहा हूँ!
    लग रहा है कि यह कविता भी
    कूलर की हवा में ही बैठकर रची गई है!

    जवाब देंहटाएं

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