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शुक्रवार, 12 जून 2009

‘‘चलना संभल-संभल कर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


एक पुरानी कविता

मौसम ने करवट बदली है, ली समीर ने अँगड़ाई।


कविता के उपवन-कानन की, हैं कलियाँ मुस्काई।।



जालिम दुनिया ने तो दिल को, समझा एक खिलौना।


खा-पीकर के फेंक दिया है, समझ चाट का दौना।।



गागर के मुख पर अमृत है, भीतर भरा हलाहल है।


नदियों के गीले तटबन्धों पर, फैला होता दलदल है।।



भँवर जाल में फँस मत जाना, सागर के समतल तल पर।


देख-भाल कर कदम बढ़ाना, चलना संभल-संभल कर।।



8 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी सीख.. बडो़ के लिये भी..

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  2. बहुत बढिया.जीवन के सच को दिखाती कविता. बधाई.

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  3. एक खुबसूरत नसीहत......अच्छी रचना

    जवाब देंहटाएं
  4. बड़ी पते की बात कही है आपने.

    जवाब देंहटाएं

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