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गुरुवार, 18 जून 2009

‘‘अमलताश के झूमर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




अमलताश के झूमर की, आभा-शोभा न्यारी है।

मनमोहक मुस्कान तुम्हारी, सबको लगती प्यारी है।।

लू के गरम थपेड़े खाकर, रंग बसन्ती पाया है।

पीले फूलों के गजरों से, सबका मन भरमाया है।।

तपती गरमी में तुमने, अपना सौन्दर्य निखारा है।

किसके इन्तजार में तुमने, अपना रूप संवारा है।।

दूर गगन से सूरज, यह सुन्दरता झाँक रहा है।

बिना पलक झपकाये, इन फूलों को ताक रहा है।।

अग्नि में तप कर, कुन्दन का रूप निखर जाता है।

तप करके प्राणी, ईश्वर से सिद्धी का वर पाता है।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)


6 टिप्‍पणियां:

  1. गर्मियों में जब चारों ओर जल संकट को लेकर त्राहि-त्राहि मची होती है, तब अमलतास और गुलमोहर दोनों को ही बेहिसाब फलता-फूलता देख कर सुखद आश्चर्य होता है.सुन्दर रचना.

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  2. बहुत सुंदरतम रचना बधाई.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  3. सचमुच आपने तपती लू में भी कितना कोमल पल खुज लिया है............ अमलतास ऐसे ही खिलता रहता है

    जवाब देंहटाएं
  4. तपती गरमी में तुमने, अपना सौन्दर्य निखारा है।
    किसके इन्तजार में तुमने, अपना रूप संवारा है।।
    दूर गगन से सूरज, यह सुन्दरता झाँक रहा है।
    बिना पलक झपकाये, इन फूलों को ताक रहा है।।

    बड़े भाई ,
    बहुत ही सुन्दर कविता रची है आपने . बधाई!!

    जवाब देंहटाएं

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