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शनिवार, 27 जून 2009

‘‘काले अक्षर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

काले अक्षर कभी-कभी, तो बहुत सताते है।

कभी-कभी सुख का, सन्देशा भी दे जाते हैं।।


इनका गहरा दर्द मुझे, अपना सा ही लगता है।

कभी बेरुखी कभी प्यार से, मीठी बातें करता है।।


अक्षर में ही राज भरे हैं, छिपे बहुत से रूप।

जख्म जिन्दगी में दे जाता, अक्षर बड़ा अनूप।।


जीवन के दोराहे पर, पूरा घर-बार पड़ा है।

किसी-किसी का तो, अभिनव संसार खड़ा है।।


पग-पग पर मिलते हैं, ऐसे दोराहे और चौराहें।

केवल समय दिखा सकता है, सीधी-सच्ची राहें।।


चूहा-बिल्ली, पिल्ला-पिल्ली से लगते हैं काले अक्षर।

इसी लिए तो कहते हैं जी काला अक्षर भैंस बराबर।।


7 टिप्‍पणियां:

  1. dhnya ho mayankji,

    atte saral aur sahaj grahiya shbdon me kitti gahri baat kar dete ho

    man abhibhoot ho jata hai...
    aapka haardik abhinandan !

    जवाब देंहटाएं
  2. aap ke rachna aap ke anubhav ko darshati hai
    aap bhut hi gahrai main ja kar likhte hai

    जवाब देंहटाएं
  3. aksharon से bolti akshar के upar likhi सुन्दर रचना है...........

    जवाब देंहटाएं

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