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रविवार, 28 जून 2009

‘‘फ्रिज’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


















बाबा जी का रेफ्रीजेटर,

लाल रंग का बड़ा सलोना।


किन्तु हमारा है छोटा सा,


लगता जैसे एक खिलौना।।



सब्जी, दूध, दही, मक्खन,


फ्रिज में आरक्षित रहता।


पानी रखो बर्फ जमाओ,


मैं दादी-अम्माँ से कहता।।



ठण्डी-ठण्डी आइस-क्रीम भी,


इसमें है जम जाती।


गर्मी के मौसम में कुल्फी,


बच्चों के मन को भाती।।



आम, सेब, अंगूर आदि फल,


फ्रिज में रखे जाते हैं।


ठण्डे पानी की बोतल,


हम इसमें से ही लाते हैं।।



इस अल्मारी को लाने की,


इच्छा है जन-जन में।


फ्रिज को पाने की जिज्ञासा,


हर नारी के मन में।।



घड़े और मटकी का इसने,

तो कर दिया सफाया है।

समय पुराना बीत गया,

अब नया जमाना आया है।।


8 टिप्‍पणियां:

  1. शास्त्री जी एक अनुरोध है कि आप अपनी रचनाओं का संकलन PDF फोरमेट में करके रखें और मुझ जैसे अपने फ़ैन को हो सके तो दे दें। इससे आपकी अनूठी रचनाओं को सहेजने में सुविधा होगी।

    जवाब देंहटाएं
  2. घड़े और मटकी का इसने,

    तो कर दिया सफाया है।

    समय पुराना बीत गया,

    अब नया जमाना आया है।।

    bahut badhia rachna!

    जवाब देंहटाएं
  3. मटकों के लिये बहुत बुरा किया.. बाकि तो भई काम कि चीज है..

    जवाब देंहटाएं
  4. waah waah
    anand se bhar diya
    aapka frij bada dhaakad hai

    mera kaleja thanda kar diya.............

    जवाब देंहटाएं
  5. क्या कहने फ़्रिज देवता के गुणगान के, बहुत सुंदर लगी आप की यह बाल कविता, ओर यह मटकी देखे तो सदिया बीत गई,

    जवाब देंहटाएं
  6. फ्रिज गीत गर्म है
    एक नए फ्रिज की
    सूचना देना धर्म है
    http://tetalaa.blogspot.com/2009/06/blog-post_20.html
    यहां पर आइए और नये बहुपयोगी फ्रिज से रूबरू होइए।

    जवाब देंहटाएं

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