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सोमवार, 15 जून 2009

‘‘ऐ सुमन! तुम क्यों सुमन हो?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मन सुमन से पूछता है,

ऐ सुमन! तुम क्यों सुमन हो?
कण्टकों में जी रहे हो,

कष्ट अपना पी रहे हो,

हँस रहे फिर भी मगन हो।

ऐ सुमन! तुम क्यों सुमन हो?


देवता होते तुम्हीं से है सुशोभित,

तितलियाँ मन-प्राण से हैं बहुत मोहित,

क्योंकि तुम मधु के सदन हो।

ऐ सुमन! तुम क्यों सुमन हो?


तुम बसे हो भ्रमर के चंचल नयन में,

गन्ध पाकर वो चला आया चमन में,

तुम मधुप के प्राण-धन हो।

ऐ सुमन! तुम क्यों सुमन हो?


एक दिन ऐसा समय भी आयेगा,

तोड़ कर माली तुम्हें ले जायेगा,

क्योंकि तुम सुन्दर सुमन हो।

ऐ सुमन! तुम क्यों सुमन हो?

6 टिप्‍पणियां:

  1. एक दिन ऐसा समय भी आयेगा,
    तोड़ कर माली तुम्हें ले जायेगा,
    क्योंकि तुम सुन्दर सुमन हो।
    ऐ सुमन! तुम क्यों सुमन हो?
    suman isliye suman hai kyonki wo suman hai
    behad achchhi lagi rachana

    जवाब देंहटाएं
  2. प्रश्न सुमन के सामने देत मयंक जवाब।
    लिखा सुमन पर गीत जो सुमन कहे आदाब।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

    जवाब देंहटाएं
  3. आपने तो मन मोह लिया बहुत सुन्दर रचना है

    जवाब देंहटाएं

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